एकादशी 2026–2027: तिथि, कैलेंडर, व्रत विधि और पारण
एकादशी 2026–2027 की तिथियाँ, व्रत विधि, पारण नियम, हरिवासर, व्रत में क्या खाएं और प्रमुख एकादशियों की पूरी जानकारी पढ़ें।
एकादशी कब है? — संक्षिप्त उत्तर
एकादशी प्रत्येक हिंदू मास के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को आती है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। व्रती एकादशी के दिन उपवास और विष्णु पूजन करते हैं तथा अगले दिन द्वादशी तिथि में निर्धारित पारण समय के भीतर व्रत खोलते हैं।
❝एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोः अपि।
— ब्रह्म-वैवर्त पुराण
इस महीने की एकादशी कब है?
इस महीने एकादशी की कोई तिथि नहीं है। आगामी एकादशी: रमा एकादशी — 5 नवंबर 2026 (गुरुवार)।
हर महीने एकादशी कब है?
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 18 जनवरी 2027 | सोमवार | पौष, शुक्ल दशमी | पौष पुत्रदा एकादशी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 2 फरवरी 2027 | मंगलवार | पौष, कृष्ण एकादशी | षटतिला एकादशी |
| 17 फरवरी 2027 | बुधवार | माघ, शुक्ल एकादशी | जया एकादशी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 4 मार्च 2027 | गुरुवार | माघ, कृष्ण एकादशी | विजया एकादशी |
| 18 मार्च 2027 | गुरुवार | फाल्गुन, शुक्ल एकादशी | रंगभरनी / आमलकी एकादशी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 2 अप्रैल 2027 | शुक्रवार | फाल्गुन, कृष्ण एकादशी | पापमोचिनी एकादशी |
| 17 अप्रैल 2027 | शनिवार | चैत्र, शुक्ल एकादशी | कामदा एकादशी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 2 मई 2027 | रविवार | चैत्र, कृष्ण एकादशी | वरूथिनी एकादशी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 1 जून 2027 | मंगलवार | वैशाख, कृष्ण एकादशी | अपरा एकादशी |
| 14 जून 2027 | सोमवार | वैशाख, शुक्ल एकादशी | निर्जला एकादशी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 11 सितंबर 2027 | शनिवार | श्रावण, शुक्ल एकादशी | श्रावण पुत्रदा एकादशी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 5 नवंबर 2026 | गुरुवार | आश्विन, कृष्ण एकादशी | रमा एकादशी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 4 दिसंबर 2026 | शुक्रवार | कार्तिक, कृष्ण एकादशी | उत्पन्ना एकादशी व्रत |
| 23 दिसंबर 2027 | गुरुवार | मार्गशीर्ष, कृष्ण एकादशी | सफला एकादशी |
| तारीख | दिन | तिथि / पक्ष | नाम | पारण | |
|---|---|---|---|---|---|
| 5 नवंबर 2026 | गुरुवार | आश्विन, कृष्ण एकादशी | रमा एकादशी | 6 नवंबर, प्रातः* | देखें |
| 4 दिसंबर 2026 | शुक्रवार | कार्तिक, कृष्ण एकादशी | उत्पन्ना एकादशी व्रत | 5 दिसंबर, प्रातः* | देखें |
| 18 जनवरी 2027 | सोमवार | पौष, शुक्ल दशमी | पौष पुत्रदा एकादशी | 19 जनवरी, प्रातः* | देखें |
| 2 फरवरी 2027 | मंगलवार | पौष, कृष्ण एकादशी | षटतिला एकादशी | 3 फरवरी, प्रातः* | देखें |
| 17 फरवरी 2027 | बुधवार | माघ, शुक्ल एकादशी | जया एकादशी | 18 फरवरी, प्रातः* | देखें |
| 4 मार्च 2027 | गुरुवार | माघ, कृष्ण एकादशी | विजया एकादशी | 5 मार्च, प्रातः* | देखें |
| 18 मार्च 2027 | गुरुवार | फाल्गुन, शुक्ल एकादशी | रंगभरनी / आमलकी एकादशी | 19 मार्च, प्रातः* | देखें |
| 2 अप्रैल 2027 | शुक्रवार | फाल्गुन, कृष्ण एकादशी | पापमोचिनी एकादशी | 3 अप्रैल, प्रातः* | देखें |
| 17 अप्रैल 2027 | शनिवार | चैत्र, शुक्ल एकादशी | कामदा एकादशी | 18 अप्रैल, प्रातः* | देखें |
| 2 मई 2027 | रविवार | चैत्र, कृष्ण एकादशी | वरूथिनी एकादशी | 3 मई, प्रातः* | देखें |
| 1 जून 2027 | मंगलवार | वैशाख, कृष्ण एकादशी | अपरा एकादशी | 2 जून, प्रातः* | देखें |
| 14 जून 2027 | सोमवार | वैशाख, शुक्ल एकादशी | निर्जला एकादशी | 15 जून, प्रातः* | देखें |
| 11 सितंबर 2027 | शनिवार | श्रावण, शुक्ल एकादशी | श्रावण पुत्रदा एकादशी | 12 सितंबर, प्रातः* | देखें |
| 23 दिसंबर 2027 | गुरुवार | मार्गशीर्ष, कृष्ण एकादशी | सफला एकादशी | 24 दिसंबर, प्रातः* | देखें |
* पारण अगले दिन (द्वादशी/अगली तिथि) प्रातः, सूर्योदय के बाद — सटीक मुहूर्त स्थान के अनुसार बदलता है; स्थानीय पंचांग देखें।
एकादशी आरंभ और समाप्ति
| तारीख | दिन | तिथि आरंभ → समाप्ति |
|---|---|---|
| 5 नवंबर 2026 | गुरुवार | 4 नवंबर 4:33 PM → 5 नवंबर 4:05 PM |
| 4 दिसंबर 2026 | शुक्रवार | 4 दिसंबर 4:33 AM → 5 दिसंबर 5:14 AM |
| 18 जनवरी 2027 | सोमवार | 18 जनवरी 3:56 PM → 19 जनवरी 1:19 PM |
| 2 फरवरी 2027 | मंगलवार | 1 फरवरी 2:11 PM → 2 फरवरी 4:40 PM |
| 17 फरवरी 2027 | बुधवार | 17 फरवरी 1:49 AM → 17 फरवरी 11:01 PM |
| 4 मार्च 2027 | गुरुवार | 3 मार्च 10:14 AM → 4 मार्च 12:54 PM |
| 18 मार्च 2027 | गुरुवार | 18 मार्च 9:51 AM → 19 मार्च 7:21 AM |
| 2 अप्रैल 2027 | शुक्रवार | 2 अप्रैल 6:15 AM → 3 अप्रैल 8:21 AM |
| 17 अप्रैल 2027 | शनिवार | 16 अप्रैल 4:51 PM → 17 अप्रैल 2:57 PM |
| 2 मई 2027 | रविवार | 2 मई 12:23 AM → 3 मई 1:21 AM |
| 1 जून 2027 | मंगलवार | 31 मई 3:32 PM → 1 जून 3:09 PM |
| 14 जून 2027 | सोमवार | 14 जून 7:41 AM → 15 जून 7:37 AM |
| 11 सितंबर 2027 | शनिवार | 11 सितंबर 7:30 AM → 12 सितंबर 9:48 AM |
| 23 दिसंबर 2027 | गुरुवार | 23 दिसंबर 5:10 AM → 24 दिसंबर 4:41 AM |
एकादशी क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?
एकादशी हिंदू पंचांग की ग्यारहवीं तिथि है। यह प्रत्येक मास में दो बार, एक बार शुक्ल पक्ष और दूसरी बार कृष्ण पक्ष में, आती है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और इसे उपवास, आत्मसंयम तथा भक्ति का विशेष दिन माना जाता है। सामान्य वर्ष में 24 एकादशी होती हैं, जबकि अधिकमास होने पर इनकी संख्या 26 हो सकती है। प्रत्येक एकादशी का अपना नाम, महत्व और उससे जुड़ी कथा होती है।
एकादशी व्रत के नियम दशमी तिथि से ही आरंभ हो जाते हैं। व्रती दशमी को सात्विक भोजन करते हैं और एकादशी के दिन अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल उपवास, फलाहार या अन्न का त्याग करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र-जप, विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता का पाठ और व्रत कथा सुनने की परंपरा है। उपवास के साथ मन, वाणी और व्यवहार में संयम रखना भी इस व्रत का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है।
एकादशी का व्रत अगले दिन द्वादशी में पारण करने के बाद पूर्ण होता है। पारण सूर्योदय के बाद, हरिवासर समाप्त होने पर और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले किया जाता है। चूँकि पारण का समय सूर्योदय और स्थानीय पंचांग पर निर्भर करता है, इसलिए अपने शहर का सही पारण समय अवश्य देखना चाहिए।
एकादशी वीडियो
एकादशी को विभिन्न क्षेत्रों में क्या कहते हैं?
| क्षेत्र / परंपरा | नाम |
|---|---|
| गुजरात | अग्यारस |
| बंगाल | एकादोशी |
| महाराष्ट्र | एकादशी |
| दक्षिण भारत | एकादशी |
| उत्तर भारत | ग्यारस |
एकादशी व्रत विधि और नियम
दशमी से तैयारी: एकादशी व्रत की तैयारी दशमी तिथि से शुरू होती है। दशमी के दिन सात्विक और हल्का भोजन करें। मांसाहार, शराब, प्याज, लहसुन और अधिक मसालेदार भोजन से बचें। संभव हो तो रात में एक ही बार भोजन करें और समय पर विश्राम करें।
व्रत का संकल्प: एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखने का संकल्प लें। व्रत निर्जल, केवल जल के साथ, फलाहार या अन्न का त्याग करके रखा जा सकता है। स्वास्थ्य ठीक न होने पर कठोर उपवास न करें।
भगवान विष्णु की पूजा: पूजा स्थान को साफ करके भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें। दीप और धूप जलाएँ तथा पीले फूल, फल, चंदन और तुलसी दल अर्पित करें। तुलसी दल पहले से तोड़कर रखें; एकादशी के दिन तुलसी तोड़ने से बचें। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करें और संबंधित एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें।
व्रत में भोजन: फलाहार करने वाले लोग फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, आलू, शकरकंद, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बना भोजन ले सकते हैं। सामान्य नमक की जगह सेंधा नमक का उपयोग किया जाता है। चावल, गेहूँ, दाल और अन्य अनाज का सेवन नहीं किया जाता। क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार नियमों में अंतर हो सकता है।
दिनभर का आचरण: एकादशी केवल भोजन छोड़ने का दिन नहीं है। इस दिन क्रोध, झूठ, निंदा, कटु वचन और अनावश्यक विवाद से बचें। भगवान विष्णु का स्मरण करें, धार्मिक ग्रंथ पढ़ें और यथाशक्ति दान करें। रात्रि में भजन, कीर्तन या नाम-जप किया जा सकता है।
द्वादशी पारण: अगले दिन स्नान और भगवान विष्णु की पूजा के बाद निर्धारित समय में व्रत खोलें। पारण हरिवासर समाप्त होने के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले किया जाना चाहिए। भगवान को भोग लगाकर तुलसी-जल, फल या सात्विक भोजन से पारण करें।
स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: गर्भवती महिलाएँ, बच्चे, बुजुर्ग, बीमार व्यक्ति और नियमित दवा लेने वाले लोग निर्जल उपवास न रखें। वे अपनी क्षमता और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार फलाहार या अन्न-त्याग का नियम अपना सकते हैं।
एकादशी पारण समय और नियम
- एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में करें
- पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले करें
- हरिवासर के दौरान व्रत का पारण न करें
- हरिवासर समाप्त होने के बाद ही अन्न या फल ग्रहण करें
- पारण का समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार देखें
- यदि द्वादशी सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाए तो सूर्योदय के बाद पारण करें
- भगवान विष्णु को भोग लगाने के बाद तुलसी-जल या सात्विक भोजन से व्रत खोलें
- निर्धारित पारण समय के भीतर ही व्रत खोलने का प्रयास करें
एकादशी व्रत में क्या करें क्या ना करें?
✅ क्या करें
- दशमी के दिन सात्विक और हल्का भोजन करें
- प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें
- भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की श्रद्धापूर्वक पूजा करें
- भगवान को पीले फूल, फल और तुलसी दल अर्पित करें
- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें
- विष्णु सहस्रनाम या भगवद्गीता का पाठ करें
- संबंधित एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें
- अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल व्रत या फलाहार करें
- दिनभर सात्विक विचार और मधुर वाणी बनाए रखें
- जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या यथाशक्ति दान दें
- अपने शहर का सही द्वादशी पारण समय देखें
- हरिवासर समाप्त होने के बाद निर्धारित समय में व्रत खोलें
⛔ क्या ना करें
- एकादशी के दिन चावल, गेहूँ, दाल और अन्य अनाज न खाएं
- मांसाहार, शराब, प्याज और लहसुन का सेवन न करें
- क्रोध, झूठ, निंदा और कटु वचन से बचें
- किसी व्यक्ति का अपमान या अनावश्यक विवाद न करें
- स्वास्थ्य ठीक न होने पर जबरन निर्जल व्रत न रखें
- एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें
- पूजा और प्रसाद का अनादर न करें
- दिनभर केवल भूखे रहकर व्रत के आध्यात्मिक उद्देश्य को न भूलें
- हरिवासर के दौरान व्रत का पारण न करें
- द्वादशी का निर्धारित पारण समय बीतने न दें
- किसी दूसरे शहर का पारण समय देखकर व्रत न खोलें
- बच्चों, बुजुर्गों या बीमार व्यक्तियों पर कठोर उपवास का दबाव न डालें
नोट: क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार व्रत के नियम भिन्न हो सकते हैं — अपने घर की परंपरा को प्राथमिकता दें।
प्रमुख एकादशी और उनका महत्व
निर्जला एकादशी
जल ग्रहण किए बिना रखा जाने वाला यह वर्ष की सबसे कठिन और प्रमुख एकादशियों में से एक है
विवरण देखें →उत्पन्ना एकादशी
इस एकादशी से देवी एकादशी के प्राकट्य और एकादशी व्रत के आरंभ की कथा जुड़ी है
विवरण देखें →पौष पुत्रदा एकादशी
यह एकादशी संतान के सुख, स्वास्थ्य और मंगल की कामना से रखी जाती है
विवरण देखें →आमलकी एकादशी
इस दिन भगवान विष्णु के साथ आँवले के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा है
विवरण देखें →कामदा एकादशी
चैत्र शुक्ल पक्ष की यह एकादशी मनोकामनाओं और आत्मशुद्धि से जुड़ी मानी जाती है
विवरण देखें →परिवर्तिनी एकादशी
मान्यता है कि इस दिन योगनिद्रा के दौरान भगवान विष्णु करवट बदलते हैं
विवरण देखें →एकादशी व्रत कथा
पद्म पुराण में वर्णित प्रचलित कथा के अनुसार, प्राचीन काल में मुर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य था। उसने अपने बल से देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। परेशान होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे और उनसे रक्षा की प्रार्थना की। देवताओं की पुकार सुनकर भगवान विष्णु ने मुर दैत्य से युद्ध करने का निश्चय किया। भगवान विष्णु और मुर के बीच लंबे समय तक भयंकर युद्ध हुआ। दैत्य अत्यंत शक्तिशाली था और बार-बार नई शक्ति के साथ युद्ध करता रहा। युद्ध करते-करते भगवान विष्णु विश्राम करने के लिए बदरिकाश्रम की एक गुफा में चले गए। वहाँ वे योगनिद्रा में लीन हो गए। भगवान को सोया हुआ देखकर मुर ने उन पर आक्रमण करने का प्रयास किया। उसी समय भगवान विष्णु के दिव्य तेज से एक तेजस्वी कन्या प्रकट हुई। उसने मुर को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ और अंत में उस देवी ने मुर का वध कर दिया। जब भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागे, तो उन्होंने दैत्य को मृत देखा। उन्होंने उस कन्या से उसका परिचय और मुर के वध का पूरा वृत्तांत पूछा। कन्या ने विनम्रतापूर्वक बताया कि वह भगवान विष्णु की ही शक्ति से प्रकट हुई है और उसने मुर को उस समय मारा, जब वह छल से उन पर आक्रमण करने वाला था। भगवान विष्णु उसकी वीरता और भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उससे मनचाहा वर माँगने को कहा। कन्या ने प्रार्थना की कि जिस तिथि पर उसका प्राकट्य हुआ है, उस दिन श्रद्धापूर्वक उपवास और भगवान विष्णु की पूजा करने वाले भक्तों के संकट दूर हों। उन्हें पापों से मुक्ति मिले और जीवन में धर्म तथा सदाचार के मार्ग पर चलने की शक्ति प्राप्त हो। भगवान विष्णु ने उसका वर स्वीकार किया और कहा कि कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को प्रकट होने के कारण उसका नाम ‘एकादशी’ होगा। जो व्यक्ति इस दिन संयम, उपवास और भक्ति के साथ उनकी आराधना करेगा, उसे एकादशी देवी की कृपा प्राप्त होगी। इस कथा का संदेश केवल भोजन का त्याग करना नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों, वाणी और विचारों पर संयम रखना भी है। एकादशी का व्रत मनुष्य को लोभ, क्रोध और गलत आचरण से दूर रहकर आत्मचिंतन तथा भक्ति की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
भगवान विष्णु मंत्र
एकादशी से जुड़े तथ्य
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एकादशी शुभकामना संदेश
मुंशी प्रेमचंद के अनमोल विचार | Premchand Quotes – Quotes of Premchand – हिन्दी में मोटिवेशनल वचन
सभी संदेश देखें →शिव नामावली 108 | भगवान शिव के 108 नाम (अर्थ सहित) | Shiv Namavali With Meaning & Jaap
सभी संदेश देखें →मंत्र, कथा और देवता
एकादशी की तिथियाँ कैसे तय की गई हैं?
प्रत्येक तिथि का निर्धारण सूर्योदय के समय प्रचलित तिथि से होता है, और सूर्योदय हर नगर में भिन्न होता है — इसलिए स्थान बदलने पर किसी व्रत की तारीख़ में एक दिन का अंतर संभव है। इसी कारण Bhakti Sarovar पर समय एक राष्ट्रीय औसत नहीं, बल्कि चुने हुए नगर के वास्तविक सूर्योदय के अनुसार गणना किए जाते हैं। पूरी गणना पद्धति पढ़ें →
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