मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की ग्यारस को मनाई जाने वाली ‘उत्पन्ना एकादशी’ वह पुण्य तिथि है जब देवी एकादशी श्री विष्णु की रक्षा-शक्ति बनकर प्रकट हुईं और दैत्य मुर का संहार किया। इसलिए इसे उत्पत्ति-, प्राकट्य- या वैतरणी एकादशी भी कहा जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन का व्रत अश्वमेध यज्ञ के समान फल देता है; व्रती को हिंसा, असत्य और दुष्ट संगति से दूर रहना चाहिए। प्रातः स्नान कर पीत पुष्प, तुलसी व गंध से श्री विष्णु तथा देवी एकादशी का पूजन करें, फिर ‘ॐ नारायणाय नमः’ या ‘ॐ एकादश्यै नमः’ का जप करें। मार्गशीर्ष की शीतल हवाओं के बीच किया गया यह उपवास आत्मसंयम, स्वास्थ्य और पारिवारिक समृद्धि का द्वार खोलता है।