भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र के संगम पर मनाई जाने वाली श्रीकृष्ण जन्माष्टमी वर्षा के बाद उजली होती प्रकृति की तरह उत्साह भर देती है। इसी मास में घटती फुहारें धान के खेतों को झुका देती हैं और हवा में शरद की हल्की ठंडक घुलने लगती है, ऐसे वातावरण में गोकुल के नंदलाल का जन्मोत्सव और भी मधुर प्रतीत होता है। परंपरा है कि इस दिन सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, दिक्पाल, भूमि, पवन, अमरगण, ब्रह्मादि तथा आकाश के अधिपतियों को प्रणाम कर बालगोपाल का पूजन किया जाए। मध्यरात्रि में शिशु रूप में प्रभु का अभिषेक, झूला झुलाना और माखन-मिश्री का भोग अर्पित करना अनिवार्य माना गया है। व्रत-उपवास, कीर्तन तथा नन्हे कृष्ण की झाँकियाँ भक्तों को धर्म, आनंद और कर्तव्य-बोध से जोड़ती हैं।