कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की यह एकादशी रमा एकादशी कहलाती है। दशमी की संध्या से ही उपवास का संकल्प लेकर भक्त फलाहार त्याग देते हैं, ताकि मन, वचन और कर्म की शुद्धि साधी जा सके। एकादशी के दिन श्री विष्णु के साथ माँ लक्ष्मी के ‘रमा’ स्वरूप का विधिवत पूजन होता है। पद्म पुराण कहता है कि इस व्रत का फल कामधेनु और चिंतामणि के समान दुर्लभ है; इसके प्रभाव से घर‑आँगन में धन‑धान्य और सौभाग्य स्थायी रहते हैं। कार्तिक ऋतु शरद‑हेमन्त के संगम का महीना है, जब दीप‑पंक्तियाँ वातावरण में मधुर स्नेह भरती हैं। रमा एकादशी की साधना तुलसी‑दल अर्पण के बिना अधूरी मानी जाती है, क्योंकि यहीं से देव‑कृपा, सद्बुद्धि और पारिवारिक समृद्धि की धाराएँ प्रस्फुटित होती हैं।