आश्विन कृष्ण एकादशी को इन्दिरा एकादशी कहते हैं, और पितृपक्ष के बीच पड़ने के कारण इसे पूर्वजों की मुक्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है। पद्म पुराण बताता है कि व्रत की तैयारी दशमी से ही शुरू होती है, उस दिन केवल एक बार सात्त्विक भोजन लेकर ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। एकादशी को निर्जल या फलाहार उपवास रखते हुए शालिग्राम-नारायण का अभिषेक, तुलसी-दल, काले तिल और घृत-दीप से पूजन किया जाता है। संकल्प यह होता है कि इस पुण्य का फल पितरों को प्राप्त हो, ताकि वे भगवद्-लोक में शान्ति पाएँ और नरक-मार्ग से बचे रहें। शास्त्र मानते हैं कि इन्दिरा एकादशी का विधिवत् अनुष्ठान साधक के संग्रह किए पापों का क्षय करता है, पितृऋण को हल्का करता है और अंततः स्वयं को भी स्वर्गमार्ग का अधिकारी बनाता है।