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आवर्ती व्रत · 2026–2027

मासिक कालाष्टमी व्रत 2026–2027: तिथियाँ, भैरव पूजा विधि और कथा

मासिक कालाष्टमी व्रत 2026–2027 की तिथियाँ, भैरव पूजा विधि, कथा और पारण नियम जानें। कालभैरव जयंती से इसका अंतर और सामान्य प्रश्नों के उत्तर पढ़ें।

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मासिक कालाष्टमी कब है? — संक्षिप्त उत्तर

मासिक कालाष्टमी प्रत्येक चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से जुड़ा व्रत है। इस दिन भगवान शिव के भैरव स्वरूप की पूजा की जाती है। व्रत की तारीख तय करते समय रात्रि में अष्टमी की स्थिति देखी जाती है। पूजा और व्रत के लिए अपने स्थान का पंचांग तथा पारिवारिक परंपरा देखें।

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देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्। नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥

— श्री कालभैरवाष्टकम्, श्लोक 1
इस महीने — आश्विन मास

इस महीने की मासिक कालाष्टमी कब है?

इस महीने मासिक कालाष्टमी की कोई तिथि नहीं है। आगामी मासिक कालाष्टमी: कार्तिक कालभैरव कालाष्टमी — 1 नवंबर 2026 (रविवार)।

🕉️ भगवान कालभैरव 📅 वर्ष में 7 तिथियाँ 🪔 व्रत एवं उपवास
महीने अनुसार

हर महीने मासिक कालाष्टमी कब है?

तारीखदिनतिथिनाम
29 जनवरी 2027शुक्रवारपौष, कृष्ण अष्टमीश्री भैरव कालाष्टमी माघ
तारीखदिनतिथिनाम
28 फरवरी 2027रविवारमाघ, कृष्ण अष्टमीफाल्गुन श्री कालभैरव कालाष्टमी
तारीखदिनतिथिनाम
29 मार्च 2027सोमवारफाल्गुन, कृष्ण सप्तमीचैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत
तारीखदिनतिथिनाम
28 अप्रैल 2027बुधवारचैत्र, कृष्ण सप्तमीश्री कालभैरव कालाष्टमी वैसाख
तारीखदिनतिथिनाम
28 मई 2027शुक्रवारवैशाख, कृष्ण सप्तमीज्येष्ठ श्री कालभैरव कालाष्टमी
तारीखदिनतिथिनाम
1 नवंबर 2026रविवारआश्विन, कृष्ण सप्तमीकार्तिक कालभैरव कालाष्टमी
तारीखदिनतिथिनाम
30 दिसंबर 2026बुधवारमार्गशीर्ष, कृष्ण सप्तमीपौष श्री कालभैरव कालाष्टमी
पूर्ण सूची

मासिक कालाष्टमी सूची 2026–2027

तारीखदिनतिथि / पक्षनामपारण
1 नवंबर 2026रविवारआश्विन, कृष्ण सप्तमीकार्तिक कालभैरव कालाष्टमी2 नवंबर, प्रातः*देखें
30 दिसंबर 2026बुधवारमार्गशीर्ष, कृष्ण सप्तमीपौष श्री कालभैरव कालाष्टमी31 दिसंबर, प्रातः*देखें
29 जनवरी 2027शुक्रवारपौष, कृष्ण अष्टमीश्री भैरव कालाष्टमी माघ30 जनवरी, प्रातः*देखें
28 फरवरी 2027रविवारमाघ, कृष्ण अष्टमीफाल्गुन श्री कालभैरव कालाष्टमी 1 मार्च, प्रातः*देखें
29 मार्च 2027सोमवारफाल्गुन, कृष्ण सप्तमीचैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत31 मार्च, प्रातः*देखें
28 अप्रैल 2027बुधवारचैत्र, कृष्ण सप्तमीश्री कालभैरव कालाष्टमी वैसाख29 अप्रैल, प्रातः*देखें
28 मई 2027शुक्रवारवैशाख, कृष्ण सप्तमीज्येष्ठ श्री कालभैरव कालाष्टमी29 मई, प्रातः*देखें

* पारण अगले दिन (द्वादशी/अगली तिथि) प्रातः, सूर्योदय के बाद — सटीक मुहूर्त स्थान के अनुसार बदलता है; स्थानीय पंचांग देखें।

1नवंबर

कार्तिक कालभैरव कालाष्टमी

रविवार · आश्विन, कृष्ण सप्तमी

देखें
30दिसंबर

पौष श्री कालभैरव कालाष्टमी

बुधवार · मार्गशीर्ष, कृष्ण सप्तमी

देखें
29जनवरी

श्री भैरव कालाष्टमी माघ

शुक्रवार · पौष, कृष्ण अष्टमी

देखें
28फरवरी

फाल्गुन श्री कालभैरव कालाष्टमी

रविवार · माघ, कृष्ण अष्टमी

देखें
29मार्च

चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत

सोमवार · फाल्गुन, कृष्ण सप्तमी

देखें
28अप्रैल

श्री कालभैरव कालाष्टमी वैसाख

बुधवार · चैत्र, कृष्ण सप्तमी

देखें
28मई

ज्येष्ठ श्री कालभैरव कालाष्टमी

शुक्रवार · वैशाख, कृष्ण सप्तमी

देखें
तिथि समय

मासिक कालाष्टमी आरंभ और समाप्ति

तारीखदिनतिथि आरंभ → समाप्ति
1 नवंबर 2026रविवार1 नवंबर 8:21 PM → 2 नवंबर 6:40 PM
30 दिसंबर 2026बुधवार30 दिसंबर 6:06 PM → 31 दिसंबर 6:02 PM
29 जनवरी 2027शुक्रवार29 जनवरी 9:32 AM → 30 जनवरी 10:27 AM
28 फरवरी 2027रविवार28 फरवरी 3:24 AM → 1 मार्च 5:16 AM
29 मार्च 2027सोमवार29 मार्च 10:40 PM → 31 मार्च 1:09 AM
28 अप्रैल 2027बुधवार28 अप्रैल 6:00 PM → 29 अप्रैल 8:31 PM
28 मई 2027शुक्रवार28 मई 11:56 AM → 29 मई 1:50 PM
महत्व

मासिक कालाष्टमी क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

मासिक कालाष्टमी भगवान कालभैरव की आराधना का दिन है। यह प्रत्येक चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से जुड़ा व्रत है। भक्त इस अवसर पर भैरवजी का पूजन, नाम-जप और स्तोत्र-पाठ करते हैं। काशी की परंपरा में कालभैरव को नगर का कोतवाल माना जाता है और उनके दर्शन का विशेष महत्व है।

कालाष्टमी की साधना में श्रद्धा के साथ संयम का भी स्थान है। भक्त भय और कठिनाइयों का सामना करने का साहस तथा सही मार्ग पर चलने की बुद्धि माँगते हैं। घर पर पूजा करने वाले दीप, फूल और प्रसाद के साथ सरल विधि से आराधना कर सकते हैं।

व्रत की तारीख तय करते समय रात्रि में अष्टमी तिथि की स्थिति देखी जाती है, इसलिए केवल सूर्योदय की तिथि पर्याप्त नहीं है। मासिक कालाष्टमी के अतिरिक्त वर्ष में एक बार कालभैरव जयंती विशेष रूप से मनाई जाती है। इस पेज पर व्रत की तिथियों के साथ पूजा विधि, कथा और पारण की जानकारी दी गई है।

क्षेत्रीय नाम

मासिक कालाष्टमी को विभिन्न क्षेत्रों में क्या कहते हैं?

क्षेत्र / परंपरानाम
—कालाष्टमी
—काल अष्टमी
—मासिक भैरव अष्टमी
व्रत विधि

मासिक कालाष्टमी व्रत विधि और नियम

मासिक कालाष्टमी पर अपने परिवार या मंदिर की परंपरा के अनुसार भैरव पूजा करें। व्रत का संकल्प अपनी क्षमता देखकर लें और पूजा के साथ व्यवहार में संयम बनाए रखें।

स्नान और संकल्प

सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। भगवान शिव और कालभैरव का स्मरण करें तथा व्रत का संकल्प लें। फलाहार, एक समय भोजन या दिन-रात के उपवास में जो विधि अपनानी हो, उसे पहले स्पष्ट कर लें।

पूजा की तैयारी

पूजा स्थान साफ करके भगवान भैरव का चित्र रखें। दीप, फूल, जल और सात्त्विक प्रसाद तैयार करें। घर की सामान्य पूजा के लिए उपलब्ध सामग्री पर्याप्त है। मंदिर में पूजा कर रहे हों तो वहाँ की व्यवस्था और भोग की परंपरा का पालन करें।

संध्या और रात्रि का पूजन

संबंधित दिन की अष्टमी और अपनी परंपरा के अनुसार संध्या या रात्रि में पूजा करें। दीप जलाकर फूल और प्रसाद अर्पित करें। “ॐ भैरवाय नमः” का जप या कालभैरवाष्टकम् का पाठ करें। अंत में आरती करके साहस, सद्बुद्धि और सबके कल्याण की प्रार्थना करें।

कथा, सेवा और संयम

कालभैरव की कथा पढ़ें या सुनें और उसके संदेश पर विचार करें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद की सहायता करें। व्रत के दौरान कटु वचन, क्रोध और दूसरों के प्रति कठोर व्यवहार से बचने का प्रयास करें।

आहार और पारण

आहार के नियम अपने संकल्प और पारिवारिक विधि के अनुसार रखें। रात्रि पूजा के बाद भोजन करने की परंपरा हो तो उसी का पालन करें। दिन-रात का व्रत लिया हो तो अगले दिन पूजन के बाद पारण करें। अष्टमी की समाप्ति से संबंधित कोई विशेष नियम मानते हों तो स्थानीय पंचांग देखें।

पारण

मासिक कालाष्टमी पारण समय और नियम

  • कालाष्टमी का पारण अपने व्रत-संकल्प और पारिवारिक या मंदिर की परंपरा के अनुसार करें।
  • दिन-रात का व्रत रखा हो तो अगले दिन स्नान और भैरव पूजन के बाद पारण करने की विधि अपनाई जाती है।
  • यदि आपके यहाँ रात्रि पूजा के बाद व्रत खोलने की परंपरा है, तो उसी के अनुसार प्रसाद और भोजन ग्रहण करें।
  • अष्टमी की समाप्ति से जुड़ा नियम मानते हों तो स्थानीय पंचांग में तिथि का समय देखें।
  • पारण में अपनी परंपरा के अनुसार सादा सात्त्विक भोजन लें।
  • एकादशी के हरिवासर और द्वादशी-पारण के नियम कालाष्टमी पर लागू न करें।
⚠️ यहाँ कोई निश्चित घड़ी-समय नहीं दिया गया है — पारण मुहूर्त आपके शहर के सूर्योदय और द्वादशी समाप्ति पर निर्भर करता है। कृपया स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
भोजन एवं आचरण

मासिक कालाष्टमी व्रत में क्या करें क्या ना करें?

✅ क्या करें

  • स्थानीय पंचांग में कालाष्टमी व्रत की तारीख देखें।
  • व्रत का संकल्प अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार लें।
  • संध्या या रात्रि की पूजा के लिए सामग्री पहले तैयार रखें।
  • भगवान कालभैरव को दीप, फूल और सात्त्विक प्रसाद अर्पित करें।
  • ॐ भैरवाय नमः का जप या कालभैरवाष्टकम् का पाठ करें।
  • कथा पढ़ते समय उसके विनम्रता और जिम्मेदारी के संदेश पर विचार करें।
  • जरूरतमंदों की सहायता करें और जीवों के प्रति दया रखें।
  • पारण अपने संकल्प और परंपरा के अनुसार करें।

⛔ क्या ना करें

  • सूर्योदय पर सप्तमी देखकर कालाष्टमी की तारीख को तुरंत गलत न मानें।
  • मासिक कालाष्टमी और वार्षिक कालभैरव जयंती को एक ही अवसर न समझें।
  • अपनी क्षमता से अधिक कठोर उपवास न रखें।
  • व्रत के नाम पर नशे का सेवन न करें।
  • घर की सामान्य पूजा में किसी मंदिर की विशेष भोग-परंपरा को अनिवार्य न मानें।
  • क्रोध में अपशब्द कहने या किसी का अपमान करने से बचें।
  • महँगी सामग्री और बड़े अनुष्ठान को भक्ति की शर्त न बनाएं।
  • पूजा से हर समस्या के निश्चित समाधान का दावा न करें।
  • एकादशी के पारण नियम कालाष्टमी पर लागू न करें।

नोट: क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार व्रत के नियम भिन्न हो सकते हैं — अपने घर की परंपरा को प्राथमिकता दें।

व्रत कथा

मासिक कालाष्टमी व्रत कथा

कालाष्टमी पर भगवान कालभैरव के प्राकट्य की कथा सुनाई जाती है। वे भगवान शिव के ऐसे स्वरूप माने जाते हैं, जो धर्म की रक्षा करते हैं और अहंकार का नाश करते हैं। एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवताओं के बीच श्रेष्ठता को लेकर चर्चा हुई। ब्रह्माजी ने अभिमान में भगवान शिव के विषय में अनुचित वचन कहे। तब शिव के उग्र तेज से कालभैरव प्रकट हुए। उन्होंने ब्रह्माजी का पाँचवाँ सिर अलग कर दिया, जिससे अभिमानपूर्ण वचन निकले थे। लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं होती। ब्रह्माजी का कपाल भैरव के हाथ से चिपक गया और उन पर ब्रह्महत्या का दोष लगा। भगवान शिव के निर्देश पर वे कपाल धारण करके भिक्षाटन करने निकले। अनेक स्थानों पर जाने के बाद भी कपाल उनके हाथ से अलग नहीं हुआ। अंततः कालभैरव काशी पहुँचे। वहाँ उनके हाथ से कपाल छूट गया और उन्हें दोष से मुक्ति मिली। काशी की परंपरा में यह प्रसंग कपालमोचन से जुड़ा है। भगवान कालभैरव को काशी का कोतवाल अर्थात नगर का रक्षक माना जाता है। इस कथा में अहंकार के परिणाम के साथ कर्म की जिम्मेदारी का भाव भी है। शक्ति और पद होने पर भी अपने आचरण के प्रति सजग रहना आवश्यक है। कथा का यह पक्ष हमें विनम्रता, सत्य और संयम की याद दिलाता है।

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मंत्र

भगवान कालभैरव मंत्र

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Hare Krishna Mahamantra
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शुभकामनाएँ

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शिव नामावली 108 | भगवान शिव के 108 नाम (अर्थ सहित) | Shiv Namavali With Meaning & Jaap

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विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता

मासिक कालाष्टमी की तिथियाँ कैसे तय की गई हैं?

पंचांग-सत्यापित
गणना पद्धतिदृक् गणित (Meeus)
अयनांशलाहिड़ी (चित्रपक्ष)
तिथि का आधारसूर्योदयकालीन तिथि
सूची में तिथियाँ7
आराध्य देवभगवान कालभैरव
अंतिम संशोधन23 अक्टूबर 2026

प्रत्येक तिथि का निर्धारण सूर्योदय के समय प्रचलित तिथि से होता है, और सूर्योदय हर नगर में भिन्न होता है — इसलिए स्थान बदलने पर किसी व्रत की तारीख़ में एक दिन का अंतर संभव है। इसी कारण Bhakti Sarovar पर समय एक राष्ट्रीय औसत नहीं, बल्कि चुने हुए नगर के वास्तविक सूर्योदय के अनुसार गणना किए जाते हैं। पूरी गणना पद्धति पढ़ें →

इस पृष्ठ के योगदानकर्ता
प्रमूल लेखनप्रियंका शर्मा चशास्त्रीय सत्यापनचन्द्रभूषण मणि त्रिपाठी दीसंपादकीय समीक्षादीपक शर्मा
सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अगली मासिक कालाष्टमी कार्तिक कालभैरव कालाष्टमी 1 नवंबर 2026 को है। स्थान के अनुसार तिथि में अंतर संभव है।
यह व्रत भगवान कालभैरव को समर्पित है। उन्हें भगवान शिव का उग्र और रक्षक स्वरूप माना जाता है।
कालाष्टमी प्रत्येक चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से जुड़ी है।
व्रत का दिन तय करते समय रात्रि में अष्टमी की उपस्थिति देखी जाती है। इसलिए सूर्योदय पर सप्तमी होने के बावजूद उसी दिन कालाष्टमी पड़ सकती है।
कालाष्टमी हर चंद्र मास में आती है। वर्ष की विशेष कालाष्टमी पर कालभैरव जयंती मनाई जाती है, जिसे भगवान भैरव के प्राकट्य का दिन माना जाता है।
पूर्णिमान्त पंचांग में यह मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी और अमान्त पंचांग में कार्तिक कृष्ण अष्टमी कहलाती है। मास-नाम अलग होने पर भी पर्व एक ही है।
इस व्रत में संध्या और रात्रि की भैरव पूजा का महत्व है। संबंधित दिन की अष्टमी और अपने मंदिर की पूजा-विधि के अनुसार समय चुनें।
हाँ। स्वच्छ पूजा स्थान में भगवान भैरव के चित्र के सामने दीप, फूल और सात्त्विक प्रसाद अर्पित करके नाम-जप कर सकते हैं।
कालभैरवाष्टकम् का पाठ या “ॐ भैरवाय नमः” का जप कर सकते हैं। अपनी भाषा में भी श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें।
सभी के लिए निर्जला उपवास आवश्यक नहीं है। अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार फलाहार सहित व्रत का संकल्प लिया जा सकता है।
यह आपके संकल्प और परंपरा पर निर्भर करता है। कुछ विधियों में रात्रि पूजा के बाद और दिन-रात के व्रत में अगले दिन पूजन के बाद पारण किया जाता है।
नहीं। यह कृष्ण अष्टमी से तय होती है और सप्ताह के किसी भी दिन पड़ सकती है।
नहीं। घर पर भैरवजी की सामान्य आराधना दीप, फूल, प्रसाद, नाम-जप और स्तोत्र-पाठ से की जा सकती है।

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