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आवर्ती व्रत · 2026–2027

अमावस्या 2026–2027: तिथि, स्नान-दान और पितृ तर्पण

अमावस्या 2026–2027 की तिथियाँ, पितृ तर्पण विधि, स्नान-दान, व्रत नियम और मौनी, सोमवती तथा सर्वपितृ अमावस्या का महत्व जानें।

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अमावस्या कब है? — संक्षिप्त उत्तर

अमावस्या प्रत्येक हिंदू मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि होती है, जब चंद्रमा दिखाई नहीं देता। यह दिन पितरों के स्मरण, तर्पण, श्राद्ध, पवित्र स्नान और दान के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। तिथि और पूजा का समय स्थान तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार बदल सकता है।

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पितॄन् यान्ति पितृव्रताः।

— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 9, श्लोक 25
इस महीने — आश्विन मास

इस महीने की अमावस्या कब है?

इस महीने अमावस्या की कोई तिथि नहीं है। आगामी अमावस्या: कार्तिक अमावस्या — 9 नवंबर 2026 (सोमवार)।

🕉️ पितृ देव 📅 वर्ष में 9 तिथियाँ 🪔 व्रत एवं उपवास
महीने अनुसार

हर महीने अमावस्या कब है?

तारीखदिनतिथिनाम
6 फरवरी 2027शनिवारपौष, कृष्ण अमावस्यामाघ दर्श अमावस्या
6 फरवरी 2027शनिवारपौष, कृष्ण अमावस्यामौनी अमावस्या
तारीखदिनतिथिनाम
8 मार्च 2027सोमवारमाघ, कृष्ण अमावस्याफाल्गुन अमावस्या
तारीखदिनतिथिनाम
6 अप्रैल 2027मंगलवारफाल्गुन, कृष्ण अमावस्याचैत्र अमावस्या
तारीखदिनतिथिनाम
6 मई 2027गुरुवारचैत्र, कृष्ण अमावस्यावैसाख अमावस्या
तारीखदिनतिथिनाम
4 जून 2027शुक्रवारवैशाख, कृष्ण अमावस्याज्येष्ठ अमावस्या
तारीखदिनतिथिनाम
9 नवंबर 2026सोमवारआश्विन, कृष्ण अमावस्याकार्तिक अमावस्या
तारीखदिनतिथिनाम
8 दिसंबर 2026मंगलवारकार्तिक, कृष्ण अमावस्यामार्गशीर्ष अमावस्या
27 दिसंबर 2027सोमवारमार्गशीर्ष, कृष्ण अमावस्यापौष अमावस्या
पूर्ण सूची

अमावस्या सूची 2026–2027

तारीखदिनतिथि / पक्षनामपारण
9 नवंबर 2026सोमवारआश्विन, कृष्ण अमावस्याकार्तिक अमावस्या 10 नवंबर, प्रातः*देखें
8 दिसंबर 2026मंगलवारकार्तिक, कृष्ण अमावस्यामार्गशीर्ष अमावस्या 9 दिसंबर, प्रातः*देखें
6 फरवरी 2027शनिवारपौष, कृष्ण अमावस्यामाघ दर्श अमावस्या7 फरवरी, प्रातः*देखें
6 फरवरी 2027शनिवारपौष, कृष्ण अमावस्यामौनी अमावस्या 7 फरवरी, प्रातः*देखें
8 मार्च 2027सोमवारमाघ, कृष्ण अमावस्याफाल्गुन अमावस्या9 मार्च, प्रातः*देखें
6 अप्रैल 2027मंगलवारफाल्गुन, कृष्ण अमावस्याचैत्र अमावस्या7 अप्रैल, प्रातः*देखें
6 मई 2027गुरुवारचैत्र, कृष्ण अमावस्यावैसाख अमावस्या7 मई, प्रातः*देखें
4 जून 2027शुक्रवारवैशाख, कृष्ण अमावस्याज्येष्ठ अमावस्या5 जून, प्रातः*देखें
27 दिसंबर 2027सोमवारमार्गशीर्ष, कृष्ण अमावस्यापौष अमावस्या28 दिसंबर, प्रातः*देखें

* पारण अगले दिन (द्वादशी/अगली तिथि) प्रातः, सूर्योदय के बाद — सटीक मुहूर्त स्थान के अनुसार बदलता है; स्थानीय पंचांग देखें।

9नवंबर

कार्तिक अमावस्या

सोमवार · आश्विन, कृष्ण अमावस्या

देखें
8दिसंबर

मार्गशीर्ष अमावस्या

मंगलवार · कार्तिक, कृष्ण अमावस्या

देखें
6फरवरी

माघ दर्श अमावस्या

शनिवार · पौष, कृष्ण अमावस्या

देखें
6फरवरी

मौनी अमावस्या

शनिवार · पौष, कृष्ण अमावस्या

देखें
8मार्च

फाल्गुन अमावस्या

सोमवार · माघ, कृष्ण अमावस्या

देखें
6अप्रैल

चैत्र अमावस्या

मंगलवार · फाल्गुन, कृष्ण अमावस्या

देखें
6मई

वैसाख अमावस्या

गुरुवार · चैत्र, कृष्ण अमावस्या

देखें
4जून

ज्येष्ठ अमावस्या

शुक्रवार · वैशाख, कृष्ण अमावस्या

देखें
27दिसंबर

पौष अमावस्या

सोमवार · मार्गशीर्ष, कृष्ण अमावस्या

देखें
तिथि समय

अमावस्या आरंभ और समाप्ति

तारीखदिनतिथि आरंभ → समाप्ति
9 नवंबर 2026सोमवार8 नवंबर 4:57 PM → 9 नवंबर 6:01 PM
8 दिसंबर 2026मंगलवार8 दिसंबर 9:42 AM → 9 दिसंबर 11:51 AM
6 फरवरी 2027शनिवार6 फरवरी 12:35 AM → 7 फरवरी 2:55 AM
6 फरवरी 2027शनिवार6 फरवरी 12:35 AM → 7 फरवरी 2:55 AM
8 मार्च 2027सोमवार7 मार्च 7:16 PM → 8 मार्च 8:28 PM
6 अप्रैल 2027मंगलवार6 अप्रैल 11:10 AM → 7 अप्रैल 10:50 AM
6 मई 2027गुरुवार5 मई 11:46 PM → 6 मई 9:57 PM
4 जून 2027शुक्रवार4 जून 9:35 AM → 5 जून 6:39 AM
27 दिसंबर 2027सोमवार27 दिसंबर 5:52 AM → 28 दिसंबर 7:11 AM
महत्व

अमावस्या क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

अमावस्या प्रत्येक हिंदू मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि होती है। इस दिन चंद्रमा आकाश में दिखाई नहीं देता और इसके बाद नए चंद्र मास की शुरुआत होती है। धार्मिक परंपरा में अमावस्या को पितरों के स्मरण, तर्पण, श्राद्ध, पवित्र स्नान और दान के लिए विशेष माना गया है। सामान्यतः एक वर्ष में 12 अमावस्या होती हैं, जबकि अधिकमास होने पर इनकी संख्या 13 हो सकती है।

अमावस्या के दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान करके सूर्यदेव को जल अर्पित करते हैं। इसके बाद पितरों का स्मरण करते हुए जल, काला तिल और कुश से तर्पण किया जाता है। अन्नदान, वस्त्रदान और जरूरतमंदों को भोजन कराना भी इस दिन की प्रमुख परंपराओं में शामिल है। जो लोग व्रत रखते हैं, वे अपनी क्षमता के अनुसार उपवास या फलाहार कर सकते हैं।

हर मास की अमावस्या का नाम और महत्व अलग हो सकता है। सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या सोमवती, माघ की अमावस्या मौनी और पितृ पक्ष की अंतिम तिथि सर्वपितृ अमावस्या कहलाती है। अमावस्या तिथि तथा पूजा का उपयुक्त समय स्थान और पंचांग के अनुसार बदल सकता है, इसलिए स्थानीय समय अवश्य देखना चाहिए।

क्षेत्रीय नाम

अमावस्या को विभिन्न क्षेत्रों में क्या कहते हैं?

क्षेत्र / परंपरानाम
उत्तर भारतअमावस
गुजरातअमास
बंगालअमाबस्या
महाराष्ट्रअमावास्या
कर्नाटकअमावासे
तमिलनाडुअमावासै
व्रत विधि

अमावस्या व्रत विधि और नियम

प्रातः स्नान और संकल्प: अमावस्या के दिन प्रातः उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। संभव हो तो किसी पवित्र नदी, सरोवर या तीर्थ में स्नान करें। ऐसा संभव न हो तो घर पर स्नान के जल में थोड़ा गंगाजल मिलाया जा सकता है। इसके बाद अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार व्रत, पूजा या तर्पण का संकल्प लें।

सूर्य पूजन: स्नान के बाद तांबे के पात्र से सूर्यदेव को जल अर्पित करें। जल चढ़ाते समय भगवान सूर्य से परिवार के स्वास्थ्य और पितरों की शांति की प्रार्थना करें।

पितृ तर्पण: पितरों का नाम और गोत्र ज्ञात हो तो उनका स्मरण करें। परंपरा के अनुसार जल में काला तिल और कुश मिलाकर तर्पण किया जाता है। विधिवत श्राद्ध या पिंडदान किसी जानकार आचार्य के मार्गदर्शन में करना उचित है। सामान्य श्रद्धालु केवल जल अर्पित करके भी अपने पूर्वजों को नमन कर सकते हैं।

पूजा और स्मरण: घर के पूजा स्थान पर दीप जलाएँ और भगवान विष्णु, शिव या अपने आराध्य देव की पूजा करें। अमावस्या पर पितरों के नाम से प्रार्थना, मंत्र-जप और धार्मिक ग्रंथों का पाठ किया जा सकता है।

व्रत और भोजन: व्रत रखने वाले अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार, एक समय सात्विक भोजन या निर्जल उपवास कर सकते हैं। कठोर उपवास सभी के लिए आवश्यक नहीं है। पूजा और तर्पण पूरा होने से पहले भोजन करने से बचें।

दान: पितरों के नाम से जरूरतमंदों को अन्न, जल, वस्त्र या अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन दान करें। गाय, पक्षियों और अन्य जीवों के लिए भोजन या जल रखना भी सेवा का सरल रूप है।

व्रत का समापन: अमावस्या के लिए एक निश्चित सार्वभौमिक पारण समय नहीं होता। पूजा, तर्पण और दान पूरा करने के बाद या तिथि समाप्त होने पर पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत खोला जा सकता है। कुछ विशेष अमावस्याओं के नियम अलग हो सकते हैं।

स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: गर्भवती महिलाएँ, बच्चे, बुजुर्ग और बीमार व्यक्ति कठोर उपवास न रखें। वे सात्विक भोजन करते हुए पूजा, पितृ-स्मरण और दान कर सकते हैं।

पारण

अमावस्या पारण समय और नियम

  • अमावस्या पर व्रत रखने वाले अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पारण करें
  • पितृ तर्पण, पूजा और दान पूरा करने के बाद ही भोजन ग्रहण करें
  • यदि व्रत सूर्योदय से अमावस्या समाप्ति तक रखा गया हो तो तिथि समाप्त होने के बाद पारण करें
  • कुछ परंपराओं में अगले दिन प्रतिपदा के सूर्योदय के बाद व्रत खोला जाता है
  • सोमवती, मौनी या शनि अमावस्या के विशेष नियम अलग हो सकते हैं
  • पारण से पहले भगवान को भोग लगाकर पितरों का स्मरण करें
  • सही समय के लिए स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा को प्राथमिकता दें
  • स्वास्थ्य ठीक न हो तो कठोर या निर्जल उपवास न रखें
⚠️ यहाँ कोई निश्चित घड़ी-समय नहीं दिया गया है — पारण मुहूर्त आपके शहर के सूर्योदय और द्वादशी समाप्ति पर निर्भर करता है। कृपया स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
भोजन एवं आचरण

अमावस्या व्रत में क्या करें क्या ना करें?

✅ क्या करें

  • प्रातः स्नान करके पूजा या व्रत का संकल्प लें
  • सूर्यदेव को जल अर्पित करें
  • अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करें
  • जल, काला तिल और कुश से पितृ तर्पण करें
  • अपने आराध्य देव की पूजा और मंत्र-जप करें
  • पितरों के नाम से अन्न, जल या वस्त्र का दान करें
  • जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएं
  • गाय, पक्षियों और अन्य जीवों के लिए भोजन या जल रखें
  • अपनी क्षमता के अनुसार उपवास या फलाहार करें
  • विशेष अमावस्या के नियम स्थानीय पंचांग में देखें
  • विधिवत श्राद्ध के लिए योग्य आचार्य का मार्गदर्शन लें
  • अपने परिवार और क्षेत्र की मान्य परंपरा का सम्मान करें

⛔ क्या ना करें

  • स्वास्थ्य ठीक न होने पर जबरन निर्जल उपवास न रखें
  • पितरों के नाम पर किए जाने वाले कर्म को दिखावा न बनाएं
  • बिना जानकारी के जटिल श्राद्ध या पिंडदान विधि न करें
  • क्रोध, झूठ, निंदा और कटु वचन से बचें
  • मांसाहार, शराब और अन्य तामसिक पदार्थों का सेवन न करें
  • किसी जरूरतमंद या अतिथि का अपमान न करें
  • भोजन, जल और पूजा सामग्री का अनादर न करें
  • अमावस्या को लेकर डर या अंधविश्वास न फैलाएं
  • हर अमावस्या के लिए एक ही विशेष नियम लागू न करें
  • परिवार की परंपरा को बिना समझे न बदलें
  • बच्चों, बुजुर्गों या बीमार व्यक्तियों पर उपवास का दबाव न डालें
  • अपने शहर की जगह किसी दूसरे स्थान का तिथि समय न अपनाएं

नोट: क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार व्रत के नियम भिन्न हो सकते हैं — अपने घर की परंपरा को प्राथमिकता दें।

व्रत कथा

अमावस्या व्रत कथा

अमावस्या पर पितरों के लिए तर्पण और अन्नदान क्यों किया जाता है, इससे जुड़ी एक प्रचलित कथा महाभारत के महान योद्धा कर्ण से संबंधित है। कर्ण अपने जीवनकाल में अपनी वीरता के साथ-साथ दानशीलता के लिए भी प्रसिद्ध थे। उनके द्वार से कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था। उन्होंने जरूरतमंदों को सोना, चाँदी, रत्न और धन का भरपूर दान किया था। महाभारत युद्ध में वीरगति प्राप्त करने के बाद जब कर्ण पितृलोक पहुँचे, तो उन्हें भोजन के स्थान पर सोना और बहुमूल्य रत्न दिए गए। कर्ण ने आश्चर्य से पूछा कि यहाँ उन्हें खाने के लिए अन्न क्यों नहीं मिल रहा है। तब उन्हें बताया गया कि उन्होंने पृथ्वी पर रहते हुए जीवनभर सोना और धन तो दान किया, लेकिन अपने पूर्वजों के नाम पर कभी अन्न और जल अर्पित नहीं किया। इसी कारण पितृलोक में उन्हें वही वस्तुएँ प्राप्त हो रही थीं, जिनका उन्होंने दान किया था। कर्ण ने कहा कि उन्हें अपने पूर्वजों के विषय में जानकारी नहीं थी। जन्म के समय ही माता कुंती ने उन्हें नदी में प्रवाहित कर दिया था और उनका पालन-पोषण अधिरथ तथा राधा ने किया। इस कारण वे अपने वास्तविक कुल और पितरों के बारे में बहुत देर तक नहीं जान पाए। उन्होंने अनजाने में हुई इस कमी को पूरा करने का अवसर माँगा। कर्ण की प्रार्थना स्वीकार हुई और उन्हें कुछ समय के लिए पृथ्वी पर लौटने की अनुमति मिली। पृथ्वी पर आकर उन्होंने अपने पूर्वजों के नाम से अन्न, जल और वस्त्र का दान किया। उन्होंने जरूरतमंदों तथा ब्राह्मणों को भोजन कराया और श्रद्धापूर्वक पितरों का तर्पण किया। यह अवधि आगे चलकर पितृ पक्ष के रूप में प्रसिद्ध हुई। पितृ पक्ष की अंतिम तिथि सर्वपितृ अमावस्या मानी जाती है। मान्यता है कि जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु-तिथि ज्ञात नहीं होती, वे सर्वपितृ अमावस्या पर उनका श्राद्ध और तर्पण कर सकते हैं। मासिक अमावस्या पर भी पितरों का स्मरण करके जल, तिल और अन्न अर्पित करने की परंपरा है।

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मंत्र

पितृ देव मंत्र

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Hare Krishna Mahamantra
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शुभकामनाएँ

अमावस्या शुभकामना संदेश

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विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता

अमावस्या की तिथियाँ कैसे तय की गई हैं?

पंचांग-सत्यापित
गणना पद्धतिदृक् गणित (Meeus)
अयनांशलाहिड़ी (चित्रपक्ष)
तिथि का आधारसूर्योदयकालीन तिथि
सूची में तिथियाँ9
आराध्य देवपितृ देव
अंतिम संशोधन23 अक्टूबर 2026

प्रत्येक तिथि का निर्धारण सूर्योदय के समय प्रचलित तिथि से होता है, और सूर्योदय हर नगर में भिन्न होता है — इसलिए स्थान बदलने पर किसी व्रत की तारीख़ में एक दिन का अंतर संभव है। इसी कारण Bhakti Sarovar पर समय एक राष्ट्रीय औसत नहीं, बल्कि चुने हुए नगर के वास्तविक सूर्योदय के अनुसार गणना किए जाते हैं। पूरी गणना पद्धति पढ़ें →

इस पृष्ठ के योगदानकर्ता
प्रमूल लेखनप्रियंका शर्मा चशास्त्रीय सत्यापनचन्द्रभूषण मणि त्रिपाठी दीसंपादकीय समीक्षादीपक शर्मा
सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अगली अमावस्या कार्तिक अमावस्या 9 नवंबर 2026 को है। स्थान के अनुसार तिथि में अंतर संभव है।
अमावस्या हिंदू मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है। इस समय चंद्रमा पृथ्वी से दिखाई नहीं देता और इसके बाद नया चंद्र मास आरंभ होता है।
सामान्यतः एक चंद्र वर्ष में 12 अमावस्या होती हैं। अधिकमास होने पर इनकी संख्या 13 हो सकती है।
अमावस्या मुख्य रूप से पितरों के स्मरण और तर्पण से जुड़ी है। अलग-अलग मास की अमावस्या पर भगवान विष्णु, शिव, शनि या देवी की पूजा भी की जाती है।
श्रद्धालु स्नान करके पितरों का स्मरण करते हैं तथा जल, काला तिल और कुश से तर्पण करते हैं। अन्नदान और जरूरतमंदों को भोजन कराना भी शुभ माना जाता है।
मासिक अमावस्या पर पितरों का तर्पण और स्मरण किया जा सकता है। विधिवत श्राद्ध परिवार की परंपरा और योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में करना उचित है।
व्रत रखने वाले प्रातः संकल्प लेकर फलाहार या उपवास करते हैं। पूजा, तर्पण और दान पूरा करने के बाद पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत खोला जाता है।
अन्न, जल, वस्त्र, काला तिल और जरूरत की वस्तुओं का दान किया जा सकता है। दान अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार होना चाहिए।
सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पवित्र स्नान, पीपल पूजन और पितृ तर्पण की परंपरा है।
माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन मौन, आत्मचिंतन, पवित्र स्नान, जप और दान का विशेष महत्व माना गया है।
पितृ पक्ष की अंतिम तिथि को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इस दिन उन पूर्वजों का भी श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु-तिथि ज्ञात नहीं होती।
कई परंपराओं में अमावस्या को मांगलिक कार्यों के बजाय पूजा, तर्पण और आत्मचिंतन के लिए रखा जाता है। नियम क्षेत्र और पारिवारिक मान्यता के अनुसार अलग हो सकते हैं।
नहीं। सूर्य ग्रहण केवल अमावस्या पर हो सकता है, लेकिन हर अमावस्या को सूर्य ग्रहण नहीं होता।

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