आश्विन मास की शुक्ल एकादशी, जिसे पापांकुशा एकादशी कहते हैं, शरद ऋतु के निर्मल आकाश और मंद पवन के बीच मनायी जाती है। इस दिन साधक भगवान विष्णु के पद्मनाभ‑स्वरूप का पूजन‑अर्चन कर उन पर कमल, तुलसी‑दल और घी‑दीप अर्पित करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि यह व्रत सहस्र अश्वमेध और शत सूर्ययज्ञ के समकक्ष पुण्य प्रदान करता है; अतः इसे धारण करने वाला मोक्ष‑मार्ग की ओर अग्रसर होता है और जन्म‑जन्मांतर के पापों का क्षय अनुभव करता है। नियमों के अनुसार व्रती को दशमी से ही संयम शुरू कर देना चाहिए, वह सात अनाज (गेहूँ, उड़द, जौ, मूंग, चावल, चना, मसूर) का परित्याग करता है, क्योंकि एकादशी के दिन इन्हीं धान्यों की पूजा की जाती है। इस व्रत की साधना व्यक्ति में संयम, शुचिता और आध्यात्मिक जागरण का संचार करती है।