भाद्रपद शुक्ल एकादशी को परिवर्तिनी या पार्श्व एकादशी कहा जाता है। पुरानी कथाएँ बताती हैं कि चातुर्मास के मध्य इसी रात विष्णु अनंत‑शय्या पर करवट बदलते हैं, इसलिए यह दिन “परिवर्तन” का प्रतीक माना गया। भक्त वामन‑अवतार की मूर्ति या चित्र के आगे पंचामृत, तुलसी‑दल और गुड़‑चावल चढ़ाकर निर्जल उपवास रखते हैं और रात भर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का स्मरण करते रहते हैं। दूसरे दिन सूर्योदय के बाद फलाहार से व्रत खोलते हैं। परम्परा कि इस दिन विधिपूर्वक साधना करने से पुराने पाप क्षीण होते हैं, भीतर का आलस्य टूटता है और जीवन में धर्म, संपत्ति, संयम तथा अंततः मुक्तिदायक शांति का प्रवेश होता है, मानो स्वयं विष्णु की करवट से भाग्य की दिशा बदल जाती हो।