2026 में संकष्टी चतुर्थी कब है
संकष्टी चतुर्थी 2026 की तिथियाँ, चंद्रोदय समय, व्रत विधि, पारण नियम और मासिक संकष्टी के नाम जानें। अपने शहर के अनुसार सही समय देखें।
संकष्टी चतुर्थी कब है? — संक्षिप्त उत्तर
संकष्टी चतुर्थी प्रत्येक हिंदू मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। श्रद्धालु दिनभर उपवास रखते हैं और रात में चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं। सही तिथि और चंद्रोदय का समय स्थान के अनुसार बदल सकता है।
❝एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥
— गणपति अथर्वशीर्ष
इस महीने की संकष्टी चतुर्थी कब है?
इस सितंबर महीने में संकष्टी चतुर्थी की तिथियाँ:
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 29 सितंबर 2026 | मंगलवार | भाद्रपद, कृष्ण तृतीया | विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी |
हर महीने संकष्टी चतुर्थी कब है?
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 25 जनवरी 2027 | सोमवार | पौष, कृष्ण तृतीया | लम्बोदर संकष्टी चतुर्थी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 24 फरवरी 2027 | बुधवार | माघ, कृष्ण चतुर्थी | द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 25 मार्च 2027 | गुरुवार | फाल्गुन, कृष्ण तृतीया | भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 24 अप्रैल 2027 | शनिवार | चैत्र, कृष्ण चतुर्थी | विकट संकष्टी चतुर्थी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 24 मई 2027 | सोमवार | वैशाख, कृष्ण चतुर्थी | एकदन्त संकष्टी चतुर्थी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 20 अगस्त 2027 | शुक्रवार | श्रावण, कृष्ण तृतीया | हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 29 सितंबर 2026 | मंगलवार | भाद्रपद, कृष्ण तृतीया | विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 29 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | आश्विन, कृष्ण चतुर्थी | वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 27 नवंबर 2026 | शुक्रवार | कार्तिक, कृष्ण तृतीया | गणाधिप संकष्टी चतुर्थी |
| तारीख | दिन | तिथि | नाम |
|---|---|---|---|
| 27 दिसंबर 2026 | रविवार | मार्गशीर्ष, कृष्ण चतुर्थी | अखुरथ संकष्टी चतुर्थी |
| तारीख | दिन | तिथि / पक्ष | नाम | पारण | |
|---|---|---|---|---|---|
| 29 सितंबर 2026 | मंगलवार | भाद्रपद, कृष्ण तृतीया | विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी | 30 सितंबर, प्रातः* | देखें |
| 29 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | आश्विन, कृष्ण चतुर्थी | वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी | 30 अक्टूबर, प्रातः* | देखें |
| 27 नवंबर 2026 | शुक्रवार | कार्तिक, कृष्ण तृतीया | गणाधिप संकष्टी चतुर्थी | 28 नवंबर, प्रातः* | देखें |
| 27 दिसंबर 2026 | रविवार | मार्गशीर्ष, कृष्ण चतुर्थी | अखुरथ संकष्टी चतुर्थी | 28 दिसंबर, प्रातः* | देखें |
| 25 जनवरी 2027 | सोमवार | पौष, कृष्ण तृतीया | लम्बोदर संकष्टी चतुर्थी | 26 जनवरी, प्रातः* | देखें |
| 24 फरवरी 2027 | बुधवार | माघ, कृष्ण चतुर्थी | द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी | 25 फरवरी, प्रातः* | देखें |
| 25 मार्च 2027 | गुरुवार | फाल्गुन, कृष्ण तृतीया | भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी | 26 मार्च, प्रातः* | देखें |
| 24 अप्रैल 2027 | शनिवार | चैत्र, कृष्ण चतुर्थी | विकट संकष्टी चतुर्थी | 25 अप्रैल, प्रातः* | देखें |
| 24 मई 2027 | सोमवार | वैशाख, कृष्ण चतुर्थी | एकदन्त संकष्टी चतुर्थी | 25 मई, प्रातः* | देखें |
| 20 अगस्त 2027 | शुक्रवार | श्रावण, कृष्ण तृतीया | हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी | 21 अगस्त, प्रातः* | देखें |
* पारण अगले दिन (द्वादशी/अगली तिथि) प्रातः, सूर्योदय के बाद — सटीक मुहूर्त स्थान के अनुसार बदलता है; स्थानीय पंचांग देखें।
संकष्टी चतुर्थी आरंभ और समाप्ति
| तारीख | दिन | तिथि आरंभ → समाप्ति |
|---|---|---|
| 29 सितंबर 2026 | मंगलवार | 29 सितंबर 10:39 PM → 30 सितंबर 8:25 PM |
| 29 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | 29 अक्टूबर 6:36 AM → 30 अक्टूबर 3:39 AM |
| 27 नवंबर 2026 | शुक्रवार | 27 नवंबर 3:18 PM → 28 नवंबर 12:09 PM |
| 27 दिसंबर 2026 | रविवार | 27 दिसंबर 1:34 AM → 27 दिसंबर 10:42 PM |
| 25 जनवरी 2027 | सोमवार | 25 जनवरी 1:40 PM → 26 जनवरी 11:30 AM |
| 24 फरवरी 2027 | बुधवार | 24 फरवरी 3:18 AM → 25 फरवरी 2:09 AM |
| 25 मार्च 2027 | गुरुवार | 25 मार्च 6:07 PM → 26 मार्च 6:13 PM |
| 24 अप्रैल 2027 | शनिवार | 24 अप्रैल 9:50 AM → 25 अप्रैल 11:11 AM |
| 24 मई 2027 | सोमवार | 24 मई 2:11 AM → 25 मई 4:28 AM |
| 20 अगस्त 2027 | शुक्रवार | 20 अगस्त 2:20 PM → 21 अगस्त 1:11 PM |
संकष्टी चतुर्थी क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?
संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित एक प्रमुख मासिक व्रत है। यह प्रत्येक हिंदू मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। ‘संकष्टी’ का अर्थ है संकटों से मुक्ति दिलाने वाली। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक गणेश जी की पूजा करने से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं और भक्त को कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए धैर्य, बुद्धि और आत्मविश्वास मिलता है।
इस दिन व्रती प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल उपवास या फलाहार करते हैं। शाम को भगवान गणेश की पूजा की जाती है। उन्हें दूर्वा, फूल, मोदक या लड्डू अर्पित किए जाते हैं और संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है। रात में चंद्रमा के दर्शन करके अर्घ्य देने के बाद व्रत पूर्ण किया जाता है।
हर मास की संकष्टी चतुर्थी का अलग नाम और उससे जुड़ा गणेश स्वरूप माना गया है। मंगलवार को पड़ने वाली संकष्टी को अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस व्रत की तारीख उस दिन चतुर्थी तिथि के दौरान होने वाले चंद्रोदय के आधार पर तय होती है। चंद्रोदय का समय स्थान के अनुसार बदलता है, इसलिए व्रत खोलने से पहले अपने शहर का सही समय अवश्य देखना चाहिए।
संकष्टी चतुर्थी को विभिन्न क्षेत्रों में क्या कहते हैं?
| क्षेत्र / परंपरा | नाम |
|---|---|
| — | संकटहर चतुर्थी |
| — | संकटहरा चतुर्थी |
| — | संकष्टी |
| — | संकट चौथ |
| — | गणेश संकष्टी |
| — | अंगारकी चतुर्थी |
संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और नियम
व्रत का संकल्प: संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। भगवान गणेश का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। यह व्रत अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल या फलाहार के साथ रखा जा सकता है।
व्रत में आहार: फलाहार करने वाले लोग फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बना भोजन ले सकते हैं। सामान्य नमक और अनाज से परहेज किया जाता है। भोजन संबंधी नियम परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं।
भगवान गणेश की पूजा: पूजा स्थान को साफ करके भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। दीप और धूप जलाएँ तथा रोली, अक्षत, लाल या पीले फूल और दूर्वा अर्पित करें। गणेश जी को मोदक, लड्डू, गुड़ या फल का भोग लगाया जा सकता है। इसके बाद ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जप करें और संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। अंत में भगवान गणेश की आरती करें।
चंद्रमा को अर्घ्य: संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्र दर्शन का विशेष महत्व है। शाम की पूजा के बाद अपने शहर के चंद्रोदय समय की प्रतीक्षा करें। चंद्रमा दिखाई देने पर जल से अर्घ्य दें और भगवान गणेश से सुख, बुद्धि तथा संकटों से रक्षा की प्रार्थना करें।
व्रत का पारण: चंद्रमा को अर्घ्य देने और पूजा पूरी करने के बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोला जाता है। बादलों या मौसम के कारण चंद्रमा दिखाई न दे तो स्थानीय पंचांग में दिए गए चंद्रोदय समय के बाद अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा करके व्रत खोला जा सकता है।
स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग, बच्चे, बीमार व्यक्ति और नियमित दवा लेने वाले लोग कठोर या निर्जल उपवास न रखें। वे अपनी सेहत और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार फलाहार करते हुए भगवान गणेश की पूजा कर सकते हैं। श्रद्धा के साथ-साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है।
संकष्टी चतुर्थी पारण समय और नियम
- संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रोदय के बाद खोला जाता है
- चंद्रमा को जल से अर्घ्य देकर भगवान गणेश की पूजा करें
- पूजा और व्रत कथा पूरी करने के बाद पारण करें
- चंद्रोदय का समय हर शहर में अलग हो सकता है
- बादलों के कारण चंद्रमा न दिखे तो स्थानीय पंचांग में दिया गया चंद्रोदय समय देखें
- फलाहार या सामान्य भोजन से पारण अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार करें
संकष्टी चतुर्थी व्रत में क्या करें क्या ना करें?
✅ क्या करें
- प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें
- पूजा स्थान को साफ और शांत रखें
- भगवान गणेश को दूर्वा, फूल और मोदक या लड्डू अर्पित करें
- ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का जप करें
- संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें
- अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल व्रत या फलाहार करें
- शाम को भगवान गणेश की आरती करें
- अपने शहर का सही चंद्रोदय समय अवश्य देखें
- चंद्रमा के दर्शन करके जल से अर्घ्य दें
- पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें
- अपनी सेहत और पारिवारिक परंपरा का ध्यान रखें
- जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान दें
⛔ क्या ना करें
- स्वास्थ्य ठीक न होने पर जबरन निर्जल व्रत न रखें
- चंद्रमा को अर्घ्य देने से पहले व्रत न खोलें
- सामान्य नमक, अनाज और तामसिक भोजन का सेवन न करें
- शराब, तंबाकू और नशीली वस्तुओं का सेवन न करें
- पूजा के समय क्रोध, झूठ और कटु वचन से बचें
- घर में अनावश्यक विवाद या किसी का अपमान न करें
- पूजा सामग्री और प्रसाद का अनादर न करें
- किसी दूसरे शहर का चंद्रोदय समय देखकर व्रत न खोलें
- अपनी सेहत की अनदेखी करके कठोर उपवास न करें
- व्रत के नियमों को लेकर दूसरों पर दबाव न डालें
- अलग-अलग पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपराओं का उपहास न करें
नोट: क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार व्रत के नियम भिन्न हो सकते हैं — अपने घर की परंपरा को प्राथमिकता दें।
प्रमुख संकष्टी चतुर्थी और उनका महत्व
विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी
इस दिन भगवान गणेश के विघ्नराज स्वरूप की पूजा कर बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है
विवरण देखें →वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी
भगवान गणेश के वक्रतुण्ड स्वरूप को समर्पित यह व्रत संकटों और विघ्नों को दूर करने वाला माना जाता है
विवरण देखें →गणाधिप संकष्टी चतुर्थी
इस संकष्टी पर गणों के अधिपति भगवान गणेश की श्रद्धापूर्वक आराधना की जाती है
विवरण देखें →अखुरथ संकष्टी चतुर्थी
भगवान गणेश के अखुरथ स्वरूप की पूजा सुख, शांति और संकटों से रक्षा की कामना से की जाती है
विवरण देखें →लम्बोदर संकष्टी चतुर्थी
इस दिन भगवान गणेश के लम्बोदर स्वरूप की पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है
विवरण देखें →द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी
भगवान गणेश के द्विजप्रिय स्वरूप को समर्पित यह मासिक व्रत श्रद्धा और नियम से रखा जाता है
विवरण देखें →भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी
इस संकष्टी पर भगवान गणेश के भालचन्द्र स्वरूप की पूजा कर सुख और मंगल की कामना की जाती है
विवरण देखें →विकट संकष्टी चतुर्थी
भगवान गणेश के विकट स्वरूप को समर्पित यह व्रत कठिनाइयों से उबरने की प्रार्थना के साथ रखा जाता है
विवरण देखें →एकदन्त संकष्टी चतुर्थी
इस दिन भगवान गणेश के एकदन्त स्वरूप की पूजा कर बुद्धि, सफलता और शुभता की कामना की जाती है
विवरण देखें →हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी
भगवान गणेश के हेरम्ब स्वरूप की आराधना सुरक्षा, साहस और संकटों से मुक्ति के लिए की जाती है
विवरण देखें →संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। वहाँ माता पार्वती ने भगवान शिव से चौपड़ खेलने की इच्छा जताई। खेल आरंभ करने से पहले यह प्रश्न उठा कि दोनों में से किसकी जीत हुई, इसका निर्णय कौन करेगा। आसपास कोई तीसरा व्यक्ति उपस्थित नहीं था, इसलिए माता पार्वती ने मिट्टी से एक सुंदर बालक बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने बालक से कहा कि वह खेल को ध्यान से देखे और अंत में निष्पक्ष होकर विजेता का नाम बताए। भगवान शिव और माता पार्वती ने तीन बार चौपड़ खेली। तीनों बार माता पार्वती विजयी हुईं, लेकिन बालक ने भूलवश हर बार भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया। अपने साथ हुए इस अन्याय से माता पार्वती बहुत क्रोधित हुईं। उन्होंने बालक को शाप दिया कि वह दुर्बल होकर कष्ट भोगेगा और अपने पैरों से चल नहीं पाएगा। शाप मिलते ही बालक को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने माता पार्वती के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी और कहा कि उसने जानबूझकर असत्य नहीं कहा था। उससे अज्ञानवश भूल हो गई थी। बालक को पश्चाताप करते देखकर माता पार्वती का हृदय पिघल गया। उन्होंने कहा कि दिया हुआ शाप पूरी तरह वापस नहीं लिया जा सकता, लेकिन उससे मुक्ति पाने का एक उपाय है। माता पार्वती ने बालक से कहा कि कुछ समय बाद नाग कन्याएँ इस स्थान पर भगवान गणेश की पूजा करने आएँगी। वह उनसे संकष्टी चतुर्थी व्रत की विधि पूछे और पूरी श्रद्धा तथा नियम से यह व्रत करे। इतना कहकर माता पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश लौट गईं। कुछ समय बाद नाग कन्याएँ वहाँ पहुँचीं और भगवान गणेश की पूजा करने लगीं। बालक ने विनम्रता से उनसे संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व और विधि पूछी। उन्होंने बताया कि इस दिन प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए, दिनभर संयम रखना चाहिए और भगवान गणेश को दूर्वा, फूल, फल तथा मोदक अर्पित करने चाहिए। शाम को व्रत कथा और आरती के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण किया जाता है। बालक ने बताए गए नियमों के अनुसार श्रद्धापूर्वक व्रत किया। उसने भगवान गणेश से अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी और माता-पिता के पास लौटने की प्रार्थना की। उसकी सच्ची भक्ति और पश्चाताप से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उसे कष्ट से मुक्त होने तथा स्वस्थ होने का आशीर्वाद दिया। स्वस्थ होने के बाद बालक भगवान शिव और माता पार्वती के पास पहुँचा। माता पार्वती ने उसे क्षमा कर दिया और प्रेमपूर्वक अपने पास स्थान दिया।
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संकष्टी चतुर्थी से जुड़े तथ्य
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सभी संदेश देखें →मंत्र, कथा और देवता
संकष्टी चतुर्थी की तिथियाँ कैसे तय की गई हैं?
प्रत्येक तिथि का निर्धारण सूर्योदय के समय प्रचलित तिथि से होता है, और सूर्योदय हर नगर में भिन्न होता है — इसलिए स्थान बदलने पर किसी व्रत की तारीख़ में एक दिन का अंतर संभव है। इसी कारण Bhakti Sarovar पर समय एक राष्ट्रीय औसत नहीं, बल्कि चुने हुए नगर के वास्तविक सूर्योदय के अनुसार गणना किए जाते हैं। पूरी गणना पद्धति पढ़ें →
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