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आवर्ती व्रत · 2026–2027

2026 में संकष्टी चतुर्थी कब है

संकष्टी चतुर्थी 2026 की तिथियाँ, चंद्रोदय समय, व्रत विधि, पारण नियम और मासिक संकष्टी के नाम जानें। अपने शहर के अनुसार सही समय देखें।

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संकष्टी चतुर्थी कब है? — संक्षिप्त उत्तर

संकष्टी चतुर्थी प्रत्येक हिंदू मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। श्रद्धालु दिनभर उपवास रखते हैं और रात में चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं। सही तिथि और चंद्रोदय का समय स्थान के अनुसार बदल सकता है।

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एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥

— गणपति अथर्वशीर्ष
इस महीने — भाद्रपद मास

इस महीने की संकष्टी चतुर्थी कब है?

इस सितंबर महीने में संकष्टी चतुर्थी की तिथियाँ:

तारीखदिनतिथिनाम
29 सितंबर 2026मंगलवारभाद्रपद, कृष्ण तृतीयाविघ्नराज संकष्टी चतुर्थी
🕉️ भगवान गणेश 📅 वर्ष में 10 तिथियाँ 🪔 व्रत एवं उपवास
महीने अनुसार

हर महीने संकष्टी चतुर्थी कब है?

तारीखदिनतिथिनाम
25 जनवरी 2027सोमवारपौष, कृष्ण तृतीयालम्बोदर संकष्टी चतुर्थी
तारीखदिनतिथिनाम
24 फरवरी 2027बुधवारमाघ, कृष्ण चतुर्थीद्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी
तारीखदिनतिथिनाम
25 मार्च 2027गुरुवारफाल्गुन, कृष्ण तृतीयाभालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी
तारीखदिनतिथिनाम
24 अप्रैल 2027शनिवारचैत्र, कृष्ण चतुर्थीविकट संकष्टी चतुर्थी
तारीखदिनतिथिनाम
24 मई 2027सोमवारवैशाख, कृष्ण चतुर्थीएकदन्त संकष्टी चतुर्थी
तारीखदिनतिथिनाम
20 अगस्त 2027शुक्रवारश्रावण, कृष्ण तृतीयाहेरम्ब संकष्टी चतुर्थी
तारीखदिनतिथिनाम
29 सितंबर 2026मंगलवारभाद्रपद, कृष्ण तृतीयाविघ्नराज संकष्टी चतुर्थी
तारीखदिनतिथिनाम
29 अक्टूबर 2026गुरुवारआश्विन, कृष्ण चतुर्थीवक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी
तारीखदिनतिथिनाम
27 नवंबर 2026शुक्रवारकार्तिक, कृष्ण तृतीयागणाधिप संकष्टी चतुर्थी
तारीखदिनतिथिनाम
27 दिसंबर 2026रविवारमार्गशीर्ष, कृष्ण चतुर्थीअखुरथ संकष्टी चतुर्थी
पूर्ण सूची

संकष्टी चतुर्थी सूची 2026–2027

तारीखदिनतिथि / पक्षनामपारण
29 सितंबर 2026मंगलवारभाद्रपद, कृष्ण तृतीयाविघ्नराज संकष्टी चतुर्थी 30 सितंबर, प्रातः*देखें
29 अक्टूबर 2026गुरुवारआश्विन, कृष्ण चतुर्थीवक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी 30 अक्टूबर, प्रातः*देखें
27 नवंबर 2026शुक्रवारकार्तिक, कृष्ण तृतीयागणाधिप संकष्टी चतुर्थी28 नवंबर, प्रातः*देखें
27 दिसंबर 2026रविवारमार्गशीर्ष, कृष्ण चतुर्थीअखुरथ संकष्टी चतुर्थी 28 दिसंबर, प्रातः*देखें
25 जनवरी 2027सोमवारपौष, कृष्ण तृतीयालम्बोदर संकष्टी चतुर्थी 26 जनवरी, प्रातः*देखें
24 फरवरी 2027बुधवारमाघ, कृष्ण चतुर्थीद्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी25 फरवरी, प्रातः*देखें
25 मार्च 2027गुरुवारफाल्गुन, कृष्ण तृतीयाभालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी26 मार्च, प्रातः*देखें
24 अप्रैल 2027शनिवारचैत्र, कृष्ण चतुर्थीविकट संकष्टी चतुर्थी25 अप्रैल, प्रातः*देखें
24 मई 2027सोमवारवैशाख, कृष्ण चतुर्थीएकदन्त संकष्टी चतुर्थी25 मई, प्रातः*देखें
20 अगस्त 2027शुक्रवारश्रावण, कृष्ण तृतीयाहेरम्ब संकष्टी चतुर्थी21 अगस्त, प्रातः*देखें

* पारण अगले दिन (द्वादशी/अगली तिथि) प्रातः, सूर्योदय के बाद — सटीक मुहूर्त स्थान के अनुसार बदलता है; स्थानीय पंचांग देखें।

29सितंबर

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी

मंगलवार · भाद्रपद, कृष्ण तृतीया

देखें
29अक्टूबर

वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी

गुरुवार · आश्विन, कृष्ण चतुर्थी

देखें
27नवंबर

गणाधिप संकष्टी चतुर्थी

शुक्रवार · कार्तिक, कृष्ण तृतीया

देखें
27दिसंबर

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी

रविवार · मार्गशीर्ष, कृष्ण चतुर्थी

देखें
25जनवरी

लम्बोदर संकष्टी चतुर्थी

सोमवार · पौष, कृष्ण तृतीया

देखें
24फरवरी

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी

बुधवार · माघ, कृष्ण चतुर्थी

देखें
25मार्च

भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी

गुरुवार · फाल्गुन, कृष्ण तृतीया

देखें
24अप्रैल

विकट संकष्टी चतुर्थी

शनिवार · चैत्र, कृष्ण चतुर्थी

देखें
24मई

एकदन्त संकष्टी चतुर्थी

सोमवार · वैशाख, कृष्ण चतुर्थी

देखें
20अगस्त

हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी

शुक्रवार · श्रावण, कृष्ण तृतीया

देखें
तिथि समय

संकष्टी चतुर्थी आरंभ और समाप्ति

तारीखदिनतिथि आरंभ → समाप्ति
29 सितंबर 2026मंगलवार29 सितंबर 10:39 PM → 30 सितंबर 8:25 PM
29 अक्टूबर 2026गुरुवार29 अक्टूबर 6:36 AM → 30 अक्टूबर 3:39 AM
27 नवंबर 2026शुक्रवार27 नवंबर 3:18 PM → 28 नवंबर 12:09 PM
27 दिसंबर 2026रविवार27 दिसंबर 1:34 AM → 27 दिसंबर 10:42 PM
25 जनवरी 2027सोमवार25 जनवरी 1:40 PM → 26 जनवरी 11:30 AM
24 फरवरी 2027बुधवार24 फरवरी 3:18 AM → 25 फरवरी 2:09 AM
25 मार्च 2027गुरुवार25 मार्च 6:07 PM → 26 मार्च 6:13 PM
24 अप्रैल 2027शनिवार24 अप्रैल 9:50 AM → 25 अप्रैल 11:11 AM
24 मई 2027सोमवार24 मई 2:11 AM → 25 मई 4:28 AM
20 अगस्त 2027शुक्रवार20 अगस्त 2:20 PM → 21 अगस्त 1:11 PM
महत्व

संकष्टी चतुर्थी क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित एक प्रमुख मासिक व्रत है। यह प्रत्येक हिंदू मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। ‘संकष्टी’ का अर्थ है संकटों से मुक्ति दिलाने वाली। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक गणेश जी की पूजा करने से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं और भक्त को कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए धैर्य, बुद्धि और आत्मविश्वास मिलता है।

इस दिन व्रती प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल उपवास या फलाहार करते हैं। शाम को भगवान गणेश की पूजा की जाती है। उन्हें दूर्वा, फूल, मोदक या लड्डू अर्पित किए जाते हैं और संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है। रात में चंद्रमा के दर्शन करके अर्घ्य देने के बाद व्रत पूर्ण किया जाता है।

हर मास की संकष्टी चतुर्थी का अलग नाम और उससे जुड़ा गणेश स्वरूप माना गया है। मंगलवार को पड़ने वाली संकष्टी को अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस व्रत की तारीख उस दिन चतुर्थी तिथि के दौरान होने वाले चंद्रोदय के आधार पर तय होती है। चंद्रोदय का समय स्थान के अनुसार बदलता है, इसलिए व्रत खोलने से पहले अपने शहर का सही समय अवश्य देखना चाहिए।

क्षेत्रीय नाम

संकष्टी चतुर्थी को विभिन्न क्षेत्रों में क्या कहते हैं?

क्षेत्र / परंपरानाम
—संकटहर चतुर्थी
—संकटहरा चतुर्थी
—संकष्टी
—संकट चौथ
—गणेश संकष्टी
—अंगारकी चतुर्थी
व्रत विधि

संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि और नियम

व्रत का संकल्प: संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। भगवान गणेश का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। यह व्रत अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल या फलाहार के साथ रखा जा सकता है।

व्रत में आहार: फलाहार करने वाले लोग फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बना भोजन ले सकते हैं। सामान्य नमक और अनाज से परहेज किया जाता है। भोजन संबंधी नियम परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं।

भगवान गणेश की पूजा: पूजा स्थान को साफ करके भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। दीप और धूप जलाएँ तथा रोली, अक्षत, लाल या पीले फूल और दूर्वा अर्पित करें। गणेश जी को मोदक, लड्डू, गुड़ या फल का भोग लगाया जा सकता है। इसके बाद ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जप करें और संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। अंत में भगवान गणेश की आरती करें।

चंद्रमा को अर्घ्य: संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्र दर्शन का विशेष महत्व है। शाम की पूजा के बाद अपने शहर के चंद्रोदय समय की प्रतीक्षा करें। चंद्रमा दिखाई देने पर जल से अर्घ्य दें और भगवान गणेश से सुख, बुद्धि तथा संकटों से रक्षा की प्रार्थना करें।

व्रत का पारण: चंद्रमा को अर्घ्य देने और पूजा पूरी करने के बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोला जाता है। बादलों या मौसम के कारण चंद्रमा दिखाई न दे तो स्थानीय पंचांग में दिए गए चंद्रोदय समय के बाद अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा करके व्रत खोला जा सकता है।

स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग, बच्चे, बीमार व्यक्ति और नियमित दवा लेने वाले लोग कठोर या निर्जल उपवास न रखें। वे अपनी सेहत और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार फलाहार करते हुए भगवान गणेश की पूजा कर सकते हैं। श्रद्धा के साथ-साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

पारण

संकष्टी चतुर्थी पारण समय और नियम

  • संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रोदय के बाद खोला जाता है
  • चंद्रमा को जल से अर्घ्य देकर भगवान गणेश की पूजा करें
  • पूजा और व्रत कथा पूरी करने के बाद पारण करें
  • चंद्रोदय का समय हर शहर में अलग हो सकता है
  • बादलों के कारण चंद्रमा न दिखे तो स्थानीय पंचांग में दिया गया चंद्रोदय समय देखें
  • फलाहार या सामान्य भोजन से पारण अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार करें
⚠️ यहाँ कोई निश्चित घड़ी-समय नहीं दिया गया है — पारण मुहूर्त आपके शहर के सूर्योदय और द्वादशी समाप्ति पर निर्भर करता है। कृपया स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
भोजन एवं आचरण

संकष्टी चतुर्थी व्रत में क्या करें क्या ना करें?

✅ क्या करें

  • प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें
  • पूजा स्थान को साफ और शांत रखें
  • भगवान गणेश को दूर्वा, फूल और मोदक या लड्डू अर्पित करें
  • ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का जप करें
  • संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें
  • अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल व्रत या फलाहार करें
  • शाम को भगवान गणेश की आरती करें
  • अपने शहर का सही चंद्रोदय समय अवश्य देखें
  • चंद्रमा के दर्शन करके जल से अर्घ्य दें
  • पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें
  • अपनी सेहत और पारिवारिक परंपरा का ध्यान रखें
  • जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान दें

⛔ क्या ना करें

  • स्वास्थ्य ठीक न होने पर जबरन निर्जल व्रत न रखें
  • चंद्रमा को अर्घ्य देने से पहले व्रत न खोलें
  • सामान्य नमक, अनाज और तामसिक भोजन का सेवन न करें
  • शराब, तंबाकू और नशीली वस्तुओं का सेवन न करें
  • पूजा के समय क्रोध, झूठ और कटु वचन से बचें
  • घर में अनावश्यक विवाद या किसी का अपमान न करें
  • पूजा सामग्री और प्रसाद का अनादर न करें
  • किसी दूसरे शहर का चंद्रोदय समय देखकर व्रत न खोलें
  • अपनी सेहत की अनदेखी करके कठोर उपवास न करें
  • व्रत के नियमों को लेकर दूसरों पर दबाव न डालें
  • अलग-अलग पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपराओं का उपहास न करें

नोट: क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार व्रत के नियम भिन्न हो सकते हैं — अपने घर की परंपरा को प्राथमिकता दें।

प्रमुख तिथियाँ

प्रमुख संकष्टी चतुर्थी और उनका महत्व

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी

इस दिन भगवान गणेश के विघ्नराज स्वरूप की पूजा कर बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है

विवरण देखें →

वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी

भगवान गणेश के वक्रतुण्ड स्वरूप को समर्पित यह व्रत संकटों और विघ्नों को दूर करने वाला माना जाता है

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गणाधिप संकष्टी चतुर्थी

इस संकष्टी पर गणों के अधिपति भगवान गणेश की श्रद्धापूर्वक आराधना की जाती है

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अखुरथ संकष्टी चतुर्थी

भगवान गणेश के अखुरथ स्वरूप की पूजा सुख, शांति और संकटों से रक्षा की कामना से की जाती है

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लम्बोदर संकष्टी चतुर्थी

इस दिन भगवान गणेश के लम्बोदर स्वरूप की पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है

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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी

भगवान गणेश के द्विजप्रिय स्वरूप को समर्पित यह मासिक व्रत श्रद्धा और नियम से रखा जाता है

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भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी

इस संकष्टी पर भगवान गणेश के भालचन्द्र स्वरूप की पूजा कर सुख और मंगल की कामना की जाती है

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विकट संकष्टी चतुर्थी

भगवान गणेश के विकट स्वरूप को समर्पित यह व्रत कठिनाइयों से उबरने की प्रार्थना के साथ रखा जाता है

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एकदन्त संकष्टी चतुर्थी

इस दिन भगवान गणेश के एकदन्त स्वरूप की पूजा कर बुद्धि, सफलता और शुभता की कामना की जाती है

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हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी

भगवान गणेश के हेरम्ब स्वरूप की आराधना सुरक्षा, साहस और संकटों से मुक्ति के लिए की जाती है

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व्रत कथा

संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। वहाँ माता पार्वती ने भगवान शिव से चौपड़ खेलने की इच्छा जताई। खेल आरंभ करने से पहले यह प्रश्न उठा कि दोनों में से किसकी जीत हुई, इसका निर्णय कौन करेगा। आसपास कोई तीसरा व्यक्ति उपस्थित नहीं था, इसलिए माता पार्वती ने मिट्टी से एक सुंदर बालक बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने बालक से कहा कि वह खेल को ध्यान से देखे और अंत में निष्पक्ष होकर विजेता का नाम बताए। भगवान शिव और माता पार्वती ने तीन बार चौपड़ खेली। तीनों बार माता पार्वती विजयी हुईं, लेकिन बालक ने भूलवश हर बार भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया। अपने साथ हुए इस अन्याय से माता पार्वती बहुत क्रोधित हुईं। उन्होंने बालक को शाप दिया कि वह दुर्बल होकर कष्ट भोगेगा और अपने पैरों से चल नहीं पाएगा। शाप मिलते ही बालक को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने माता पार्वती के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी और कहा कि उसने जानबूझकर असत्य नहीं कहा था। उससे अज्ञानवश भूल हो गई थी। बालक को पश्चाताप करते देखकर माता पार्वती का हृदय पिघल गया। उन्होंने कहा कि दिया हुआ शाप पूरी तरह वापस नहीं लिया जा सकता, लेकिन उससे मुक्ति पाने का एक उपाय है। माता पार्वती ने बालक से कहा कि कुछ समय बाद नाग कन्याएँ इस स्थान पर भगवान गणेश की पूजा करने आएँगी। वह उनसे संकष्टी चतुर्थी व्रत की विधि पूछे और पूरी श्रद्धा तथा नियम से यह व्रत करे। इतना कहकर माता पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश लौट गईं। कुछ समय बाद नाग कन्याएँ वहाँ पहुँचीं और भगवान गणेश की पूजा करने लगीं। बालक ने विनम्रता से उनसे संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व और विधि पूछी। उन्होंने बताया कि इस दिन प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए, दिनभर संयम रखना चाहिए और भगवान गणेश को दूर्वा, फूल, फल तथा मोदक अर्पित करने चाहिए। शाम को व्रत कथा और आरती के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण किया जाता है। बालक ने बताए गए नियमों के अनुसार श्रद्धापूर्वक व्रत किया। उसने भगवान गणेश से अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी और माता-पिता के पास लौटने की प्रार्थना की। उसकी सच्ची भक्ति और पश्चाताप से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उसे कष्ट से मुक्त होने तथा स्वस्थ होने का आशीर्वाद दिया। स्वस्थ होने के बाद बालक भगवान शिव और माता पार्वती के पास पहुँचा। माता पार्वती ने उसे क्षमा कर दिया और प्रेमपूर्वक अपने पास स्थान दिया।

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मंत्र

भगवान गणेश मंत्र

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🕉️ मंत्र
शिव मूल मंत्र
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🕉️ मंत्र
Hare Krishna Mahamantra
पूरा मंत्र पढ़ें →
शुभकामनाएँ

संकष्टी चतुर्थी शुभकामना संदेश

सभी संदेश →
💐 संदेश

मुंशी प्रेमचंद के अनमोल विचार | Premchand Quotes – Quotes of Premchand – हिन्दी में मोटिवेशनल वचन

सभी संदेश देखें →
💐 संदेश

शिव नामावली 108 | भगवान शिव के 108 नाम (अर्थ सहित) | Shiv Namavali With Meaning & Jaap

सभी संदेश देखें →
विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता

संकष्टी चतुर्थी की तिथियाँ कैसे तय की गई हैं?

पंचांग-सत्यापित
गणना पद्धतिदृक् गणित (Meeus)
अयनांशलाहिड़ी (चित्रपक्ष)
तिथि का आधारसूर्योदयकालीन तिथि
सूची में तिथियाँ10
आराध्य देवभगवान गणेश
अंतिम संशोधन25 सितंबर 2026

प्रत्येक तिथि का निर्धारण सूर्योदय के समय प्रचलित तिथि से होता है, और सूर्योदय हर नगर में भिन्न होता है — इसलिए स्थान बदलने पर किसी व्रत की तारीख़ में एक दिन का अंतर संभव है। इसी कारण Bhakti Sarovar पर समय एक राष्ट्रीय औसत नहीं, बल्कि चुने हुए नगर के वास्तविक सूर्योदय के अनुसार गणना किए जाते हैं। पूरी गणना पद्धति पढ़ें →

इस पृष्ठ के योगदानकर्ता
प्रमूल लेखनप्रियंका शर्मा चशास्त्रीय सत्यापनचन्द्रभूषण मणि त्रिपाठी दीसंपादकीय समीक्षादीपक शर्मा
सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी 29 सितंबर 2026 (मंगलवार) को है। स्थान के अनुसार तिथि में अंतर संभव है।
संकष्टी चतुर्थी प्रत्येक हिंदू मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। व्रत की सही तारीख चतुर्थी तिथि और स्थानीय चंद्रोदय के आधार पर तय होती है।
यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। श्रद्धालु उनसे संकटों से रक्षा, बुद्धि, सुख और कार्यों में सफलता की प्रार्थना करते हैं।
शाम को चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाता है। चंद्रोदय का समय अलग-अलग शहरों में भिन्न हो सकता है।
व्रत निर्जल या फलाहार दोनों प्रकार से रखा जाता है। इसका पालन अपनी सेहत, क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार करना चाहिए।
बादल या मौसम के कारण चंद्रमा दिखाई न देने पर अपने शहर के प्रमाणित पंचांग में दिया गया चंद्रोदय समय देखें। पारिवारिक परंपरा के अनुसार अर्घ्य और पूजा करके व्रत खोला जा सकता है।
जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है, तब उसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। धार्मिक परंपरा में इसे विशेष फलदायी माना गया है।
संकष्टी चतुर्थी कृष्ण पक्ष में और विनायक चतुर्थी शुक्ल पक्ष में आती है। दोनों भगवान गणेश को समर्पित हैं, लेकिन संकष्टी का व्रत चंद्र दर्शन के बाद पूर्ण होता है।
सामान्यतः प्रत्येक चंद्र मास में एक संकष्टी चतुर्थी होती है। इसलिए वर्ष में प्रायः 12 संकष्टी आती हैं। अधिकमास होने पर इनकी संख्या 13 भी हो सकती है।
भगवान गणेश को मोदक, लड्डू, गुड़, फल और दूर्वा अर्पित की जा सकती है। भोग क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है।

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