हिंदू परंपरा में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है; वर्ष भर में चौबीस एकादशियाँ आती हैं। इन सब में निर्जला एकादशी को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इसमें सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक व्रती जल तक ग्रहण नहीं करता। इस कठिन उपवास के साथ श्रीहरि विष्णु का पूजन किया जाता है, जिससे दीर्घायु और मोक्ष का आशीर्वाद प्राप्त होता है। महाभारत के समय भीमसेन ने केवल इसी एकादशी का पालन करके समस्त एकादशियों का पुण्य अर्जित किया था; तभी से इसे भीमसेनी या पाण्डव एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्घापूर्वक निर्जल रहकर यह व्रत करता है, उसे जीवन में सुख, शांति और लौकिक-पारलौकिक कल्याण की सम्पूर्ण प्राप्ति होती है।