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आवर्ती व्रत · 2026–2027

स्कन्द षष्ठी व्रत 2026–2027: तिथियाँ, पूजा विधि, नियम और कथा

स्कन्द षष्ठी व्रत 2026–2027 की तिथियाँ, कार्तिकेय पूजा विधि, व्रत कथा और पारण नियम जानें। मासिक षष्ठी और छह दिन के विशेष उत्सव का अंतर भी समझें।

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स्कन्द षष्ठी कब है? — संक्षिप्त उत्तर

स्कन्द षष्ठी व्रत प्रत्येक चंद्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी से जुड़ा है और भगवान कार्तिकेय की आराधना के लिए रखा जाता है। उन्हें मुरुगन और सुब्रह्मण्य भी कहा जाता है। व्रत की तारीख तय करने में पंचमी-षष्ठी का संयोग भी देखा जाता है, इसलिए स्थानीय पंचांग और मंदिर की परंपरा का पालन करें।

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षडाननं कुङ्कुमरक्तवर्णं महामतिं दिव्यमयूरवाहनम्। रुद्रस्य सूनुं सुरसैन्यनाथं गुहं सदा शरणमहं प्रपद्ये॥

— श्री सुब्रह्मण्य ध्यानम्, श्लोक 1
इस महीने — आश्विन मास

इस महीने की स्कन्द षष्ठी कब है?

इस महीने स्कन्द षष्ठी की कोई तिथि नहीं है। आगामी स्कन्द षष्ठी: कार्तिक स्कन्द षष्ठी — 15 नवंबर 2026 (रविवार)।

🕉️ भगवान कार्तिकेय — स्कन्द, मुरुगन और सुब्रह्मण्य 📅 वर्ष में 8 तिथियाँ 🪔 व्रत एवं उपवास
महीने अनुसार

हर महीने स्कन्द षष्ठी कब है?

तारीखदिनतिथिनाम
13 जनवरी 2027बुधवारमार्गशीर्ष, शुक्ल पंचमीपौष स्कंद षष्ठी
तारीखदिनतिथिनाम
12 फरवरी 2027शुक्रवारपौष, शुक्ल षष्ठीमाघ स्कन्द षष्ठी
तारीखदिनतिथिनाम
13 मार्च 2027शनिवारमाघ, शुक्ल पंचमीफाल्गुन स्कन्द षष्ठी
तारीखदिनतिथिनाम
12 अप्रैल 2027सोमवारफाल्गुन, शुक्ल षष्ठीचैत्र स्कन्द षष्ठी
तारीखदिनतिथिनाम
11 मई 2027मंगलवारचैत्र, शुक्ल षष्ठीवैसाख स्कन्द षष्ठी
तारीखदिनतिथिनाम
9 जून 2027बुधवारवैशाख, शुक्ल पंचमीज्येष्ठ स्कन्द षष्ठी
तारीखदिनतिथिनाम
15 नवंबर 2026रविवारआश्विन, शुक्ल षष्ठीकार्तिक स्कन्द षष्ठी
तारीखदिनतिथिनाम
15 दिसंबर 2026मंगलवारकार्तिक, शुक्ल षष्ठीसुब्रहमन्य षष्ठी, चम्पा षष्ठी, स्कन्द षष्ठी
पूर्ण सूची

स्कन्द षष्ठी सूची 2026–2027

तारीखदिनतिथि / पक्षनामपारण
15 नवंबर 2026रविवारआश्विन, शुक्ल षष्ठीकार्तिक स्कन्द षष्ठी 16 नवंबर, प्रातः*देखें
15 दिसंबर 2026मंगलवारकार्तिक, शुक्ल षष्ठीसुब्रहमन्य षष्ठी, चम्पा षष्ठी, स्कन्द षष्ठी16 दिसंबर, प्रातः*देखें
13 जनवरी 2027बुधवारमार्गशीर्ष, शुक्ल पंचमीपौष स्कंद षष्ठी14 जनवरी, प्रातः*देखें
12 फरवरी 2027शुक्रवारपौष, शुक्ल षष्ठीमाघ स्कन्द षष्ठी13 फरवरी, प्रातः*देखें
13 मार्च 2027शनिवारमाघ, शुक्ल पंचमीफाल्गुन स्कन्द षष्ठी14 मार्च, प्रातः*देखें
12 अप्रैल 2027सोमवारफाल्गुन, शुक्ल षष्ठीचैत्र स्कन्द षष्ठी13 अप्रैल, प्रातः*देखें
11 मई 2027मंगलवारचैत्र, शुक्ल षष्ठीवैसाख स्कन्द षष्ठी12 मई, प्रातः*देखें
9 जून 2027बुधवारवैशाख, शुक्ल पंचमीज्येष्ठ स्कन्द षष्ठी10 जून, प्रातः*देखें

* पारण अगले दिन (द्वादशी/अगली तिथि) प्रातः, सूर्योदय के बाद — सटीक मुहूर्त स्थान के अनुसार बदलता है; स्थानीय पंचांग देखें।

15नवंबर

कार्तिक स्कन्द षष्ठी

रविवार · आश्विन, शुक्ल षष्ठी

देखें
15दिसंबर

सुब्रहमन्य षष्ठी, चम्पा षष्ठी, स्कन्द षष्ठी

मंगलवार · कार्तिक, शुक्ल षष्ठी

देखें
13जनवरी

पौष स्कंद षष्ठी

बुधवार · मार्गशीर्ष, शुक्ल पंचमी

देखें
12फरवरी

माघ स्कन्द षष्ठी

शुक्रवार · पौष, शुक्ल षष्ठी

देखें
13मार्च

फाल्गुन स्कन्द षष्ठी

शनिवार · माघ, शुक्ल पंचमी

देखें
12अप्रैल

चैत्र स्कन्द षष्ठी

सोमवार · फाल्गुन, शुक्ल षष्ठी

देखें
11मई

वैसाख स्कन्द षष्ठी

मंगलवार · चैत्र, शुक्ल षष्ठी

देखें
9जून

ज्येष्ठ स्कन्द षष्ठी

बुधवार · वैशाख, शुक्ल पंचमी

देखें
तिथि समय

स्कन्द षष्ठी आरंभ और समाप्ति

तारीखदिनतिथि आरंभ → समाप्ति
15 नवंबर 2026रविवार15 नवंबर 4:53 AM → 16 नवंबर 7:30 AM
15 दिसंबर 2026मंगलवार15 दिसंबर 12:45 AM → 16 दिसंबर 2:49 AM
13 जनवरी 2027बुधवार13 जनवरी 6:31 PM → 14 जनवरी 7:18 PM
12 फरवरी 2027शुक्रवार12 फरवरी 8:48 AM → 13 फरवरी 8:29 AM
13 मार्च 2027शनिवार13 मार्च 7:24 PM → 14 मार्च 6:01 PM
12 अप्रैल 2027सोमवार12 अप्रैल 3:09 AM → 13 अप्रैल 1:04 AM
11 मई 2027मंगलवार11 मई 9:17 AM → 12 मई 6:53 AM
9 जून 2027बुधवार9 जून 3:05 PM → 10 जून 12:41 PM
महत्व

स्कन्द षष्ठी क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

स्कन्द षष्ठी भगवान कार्तिकेय की आराधना का दिन है। दक्षिण भारत में उन्हें मुरुगन और सुब्रह्मण्य के नाम से विशेष रूप से पूजा जाता है। मासिक व्रत शुक्ल पक्ष की षष्ठी से जुड़ा है। इस अवसर पर श्रद्धालु पूजा, नाम-जप और अपनी क्षमता के अनुसार उपवास करते हैं।

भगवान कार्तिकेय को साहस, ज्ञान और धर्म की रक्षा से जोड़ा जाता है। उनकी आराधना में भक्त कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति और सही निर्णय लेने का विवेक माँगते हैं। मंदिर जाना संभव न हो तो घर पर भी दीप जलाकर, फूल अर्पित करके और कुछ समय शांत प्रार्थना में बिताकर पूजा कर सकते हैं।

मासिक षष्ठी के अतिरिक्त कार्तिक में विशेष स्कन्द षष्ठी उत्सव मनाया जाता है। इसमें छह दिन की साधना और सूरसंहारम् का प्रमुख स्थान है। मासिक व्रत की तारीख तय करते समय पंचमी-षष्ठी का संयोग भी देखा जाता है, इसलिए संबंधित स्थान के पंचांग और मंदिर की परंपरा का अनुसरण करें।

क्षेत्रीय नाम

स्कन्द षष्ठी को विभिन्न क्षेत्रों में क्या कहते हैं?

क्षेत्र / परंपरानाम
—स्कन्द षष्ठी
—कन्द षष्ठी
व्रत विधि

स्कन्द षष्ठी व्रत विधि और नियम

स्कन्द षष्ठी की पूजा अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार करें। मासिक व्रत रख रहे हैं या वार्षिक छह दिन का अनुष्ठान, यह संकल्प लेते समय स्पष्ट रखें। दोनों की अवधि और पारण-विधि एक जैसी नहीं होती।

स्नान और संकल्प

सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। भगवान कार्तिकेय का स्मरण करें और व्रत का संकल्प लें। उपवास का स्वरूप ऐसा रखें जिसे आप सहजता से निभा सकें। दिनभर वाणी और व्यवहार में संयम बनाए रखने का प्रयास करें।

भगवान कार्तिकेय की पूजा

पूजा स्थान साफ करके भगवान कार्तिकेय का चित्र या विग्रह रखें। दीप जलाएँ और उपलब्ध फूल तथा फल अर्पित करें। विग्रह के अभिषेक की परंपरा हो तो उसकी सामग्री और उपयुक्तता के अनुसार अभिषेक करें। चित्र पर जल या दूध न चढ़ाएँ। मंदिर में वहाँ की पूजा-व्यवस्था का पालन करें।

नाम-जप और कथा

“ॐ स्कन्दाय नमः” का जप करें। सुब्रह्मण्य ध्यान-श्लोक पढ़ सकते हैं या अपनी भाषा में प्रार्थना कर सकते हैं। कन्द षष्ठी कवचम् का पाठ आपकी परंपरा में हो तो उसका अर्थ समझते हुए पाठ करें। भगवान मुरुगन की कथा पढ़कर उसके साहस, संयम और करुणा के संदेश पर विचार करें।

व्रत का आहार

फलाहार या एक समय भोजन का संकल्प लिया हो तो उसी के अनुसार सादा सात्त्विक आहार लें। छह दिन के वार्षिक अनुष्ठान में भी भोजन के नियम सभी परिवारों में एक जैसे नहीं होते। किसी दूसरे व्यक्ति की कठोर विधि को अपने लिए आवश्यक न मानें।

पारण

पूजा के बाद अपने संकल्प और पारंपरिक विधि के अनुसार व्रत खोलें। यदि आपके यहाँ मासिक षष्ठी में संध्या पूजा के बाद भोजन किया जाता है तो उसी विधि का पालन करें। तिथि या अगले दिन से जुड़ी अलग परंपरा हो तो उसके लिए स्थानीय पंचांग अथवा अपने मंदिर का मार्गदर्शन लें।

पारण

स्कन्द षष्ठी पारण समय और नियम

  • मासिक स्कन्द षष्ठी का पारण अपने संकल्प और पारिवारिक या मंदिर की परंपरा के अनुसार करें।
  • यदि दिनभर उपवास और शाम की पूजा के बाद भोजन की विधि अपनाई है, तो पूजा पूरी करके प्रसाद ग्रहण करें।
  • षष्ठी तिथि या अगले दिन से जुड़ी पारण-विधि मानते हों तो स्थानीय पंचांग के अनुसार पालन करें।
  • कार्तिक के छह दिन वाले स्कन्द षष्ठी अनुष्ठान का समापन संबंधित मंदिर या संप्रदाय की विधि से करें।
  • सभी मासिक षष्ठियों के लिए अगले दिन सुबह पारण का एक ही नियम न लगाएँ।
  • पारण में अपनी परंपरा के अनुसार सादा सात्त्विक भोजन लें।
⚠️ यहाँ कोई निश्चित घड़ी-समय नहीं दिया गया है — पारण मुहूर्त आपके शहर के सूर्योदय और द्वादशी समाप्ति पर निर्भर करता है। कृपया स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।
भोजन एवं आचरण

स्कन्द षष्ठी व्रत में क्या करें क्या ना करें?

✅ क्या करें

  • स्थानीय पंचांग में स्कन्द षष्ठी व्रत की तारीख देखें।
  • स्नान करके अपनी क्षमता के अनुसार व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान कार्तिकेय के चित्र या विग्रह के सामने दीप और फूल अर्पित करें।
  • कुछ समय ॐ स्कन्दाय नमः के जप में बिताएँ।
  • कथा या स्तोत्र का अर्थ समझते हुए पाठ करें।
  • अपनी भाषा में भी श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें।
  • मासिक व्रत और वार्षिक छह दिन के अनुष्ठान की विधि अलग समझें।
  • पूजा के साथ व्यवहार में दया, धैर्य और संयम बनाए रखें।
  • पारण अपनी पारिवारिक या मंदिर की परंपरा के अनुसार करें।

⛔ क्या ना करें

  • सूर्योदय पर पंचमी देखकर स्कन्द षष्ठी की तारीख को तुरंत गलत न मानें।
  • हर मासिक षष्ठी पर छह दिन का उपवास अनिवार्य न समझें।
  • अपनी क्षमता से अधिक कठोर उपवास का संकल्प न लें।
  • व्रत के दौरान नशे और मांसाहार से दूर रहें।
  • महँगी सामग्री जुटाने को पूजा की अनिवार्य शर्त न बनाएं।
  • अभिषेक या भोग की सामग्री व्यर्थ न करें।
  • क्रोध में कटु वचन कहने और दूसरों को दुख पहुँचाने से बचें।
  • व्रत से किसी इच्छा की निश्चित पूर्ति का दावा न करें।
  • सभी षष्ठियों में अगले दिन सुबह पारण का एक ही नियम न लगाएँ।

नोट: क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार व्रत के नियम भिन्न हो सकते हैं — अपने घर की परंपरा को प्राथमिकता दें।

व्रत कथा

स्कन्द षष्ठी व्रत कथा

स्कन्द षष्ठी की प्रसिद्ध कथा भगवान मुरुगन और असुर सूरपद्मन के युद्ध से जुड़ी है। दक्षिण भारत की भक्ति-परंपरा में यह प्रसंग बड़े आदर से सुनाया जाता है। कथा के अनुसार, सूरपद्मन के अत्याचार से देवता बहुत परेशान थे। अपनी शक्ति के अभिमान में वह दूसरों को कष्ट पहुँचाने लगा था। संकट से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने भगवान कार्तिकेय की शरण ली। देवसेना के सेनापति कार्तिकेय ने उनकी रक्षा का दायित्व संभाला और सूरपद्मन से युद्ध किया। यह संघर्ष छह दिनों तक चला। अंतिम दिन भगवान मुरुगन ने अपने दिव्य भाले, जिसे वेल कहा जाता है, से सूरपद्मन को परास्त किया। कथा के प्रचलित रूप में उसके दो भागों से मोर और मुर्गे का प्रकट होना बताया जाता है। मुरुगन ने मोर को अपना वाहन बनाया और मुर्गे को अपने ध्वज पर स्थान दिया। कथा का यही प्रसंग विशेष है। युद्ध का अंत विजय के साथ करुणा का भाव भी सामने लाता है। विरोध करने वाला सूरपद्मन अंत में भगवान की सेवा से जुड़ जाता है। इस विजय की स्मृति में वार्षिक स्कन्द षष्ठी उत्सव मनाया जाता है। इसके अंतिम दिन सूरसंहारम् में युद्ध के प्रसंग का मंचन होता है। श्रद्धालु मुरुगन की पूजा करते हैं, स्तुतियाँ गाते हैं और अपनी परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं।

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मंत्र

भगवान कार्तिकेय — स्कन्द, मुरुगन और सुब्रह्मण्य मंत्र

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🕉️ मंत्र
शिव मूल मंत्र
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Hare Krishna Mahamantra
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शुभकामनाएँ

स्कन्द षष्ठी शुभकामना संदेश

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शिव नामावली 108 | भगवान शिव के 108 नाम (अर्थ सहित) | Shiv Namavali With Meaning & Jaap

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विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता

स्कन्द षष्ठी की तिथियाँ कैसे तय की गई हैं?

पंचांग-सत्यापित
गणना पद्धतिदृक् गणित (Meeus)
अयनांशलाहिड़ी (चित्रपक्ष)
तिथि का आधारसूर्योदयकालीन तिथि
सूची में तिथियाँ8
आराध्य देवभगवान कार्तिकेय — स्कन्द, मुरुगन और सुब्रह्मण्य
अंतिम संशोधन23 अक्टूबर 2026

प्रत्येक तिथि का निर्धारण सूर्योदय के समय प्रचलित तिथि से होता है, और सूर्योदय हर नगर में भिन्न होता है — इसलिए स्थान बदलने पर किसी व्रत की तारीख़ में एक दिन का अंतर संभव है। इसी कारण Bhakti Sarovar पर समय एक राष्ट्रीय औसत नहीं, बल्कि चुने हुए नगर के वास्तविक सूर्योदय के अनुसार गणना किए जाते हैं। पूरी गणना पद्धति पढ़ें →

इस पृष्ठ के योगदानकर्ता
प्रमूल लेखनप्रियंका शर्मा चशास्त्रीय सत्यापनचन्द्रभूषण मणि त्रिपाठी दीसंपादकीय समीक्षादीपक शर्मा
सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अगली स्कन्द षष्ठी कार्तिक स्कन्द षष्ठी 15 नवंबर 2026 को है। स्थान के अनुसार तिथि में अंतर संभव है।
यह व्रत भगवान कार्तिकेय को समर्पित है। उन्हें स्कन्द, मुरुगन, सुब्रह्मण्य और षण्मुख जैसे नामों से भी जाना जाता है।
यह शुक्ल पक्ष की षष्ठी से जुड़ा व्रत है। इसकी तारीख के लिए स्थानीय पंचांग में स्कन्द षष्ठी की प्रविष्टि देखें।
इस व्रत के निर्णय में पंचमी के साथ षष्ठी का संयोग भी देखा जाता है। इसलिए सूर्योदय पर पंचमी होने के बावजूद उसी दिन व्रत पड़ सकता है।
नहीं। मासिक षष्ठी का व्रत और कार्तिक के विशेष छह दिन वाले स्कन्द षष्ठी अनुष्ठान अलग हैं।
यह भगवान मुरुगन की सूरपद्मन पर विजय की स्मृति में होने वाला उत्सव है। वार्षिक स्कन्द षष्ठी के अंतिम दिन कई मुरुगन मंदिरों में इसका मंचन होता है।
सभी के लिए निर्जला उपवास अनिवार्य नहीं है। अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार फलाहार, एक समय भोजन या उपवास का संकल्प लिया जाता है।
सरल नाम-मंत्र “ॐ स्कन्दाय नमः” का जप कर सकते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार सुब्रह्मण्य स्तुति या कन्द षष्ठी कवचम् का पाठ भी किया जाता है।
हाँ। स्वच्छ पूजा स्थान में भगवान कार्तिकेय के चित्र या विग्रह के सामने दीप, फूल और प्रसाद के साथ पूजा कर सकते हैं।
पारण अपने व्रत-संकल्प और पारिवारिक या मंदिर की विधि के अनुसार करें। मासिक व्रत और छह दिन के वार्षिक अनुष्ठान पर एक ही पारण नियम लागू नहीं होता।
हाँ। भगवान कार्तिकेय का नाम-जप और अपनी भाषा में प्रार्थना कर सकते हैं। स्तोत्र सीखना चाहें तो उसका अर्थ समझते हुए धीरे-धीरे पाठ करें।

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