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शनि देव से जुड़े रोचक तथ्य

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०१

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए गठित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट नें अपना लोगो चित्र जारी किया है, इस चित्र में भगवान श्री राम का चित्र अभय प्रदान करने की मुद्रा में है। चित्र में श्री हनुमान जी के श्रद्धावर्धन हनुमान स्वरुप को चित्रित किया गया है, जिसका अर्थ है कि नख से शिख तक हनुमान जी श्री राम जी सेवा में समर्पित हैं। आज भी श्रद्धालु पहले हनुमानगढ़ी में दर्शन के बाद ही रामलला का दर्शन करने जाते हैं, रामनगरी अयोध्या की रक्षा बजरंगबली ही करते हैं। भगवान राम सूर्यवंशी हैं इसी कारण चित्र में सुर्यवंश के प्रतीक लाल और पीले रंगों से सूर्यदेव को दर्शाया गया है। चित्र में रामो विग्रहवान धर्मः अंकित है जिसका अर्थ है श्री राम जी धर्म के मूर्तिमान स्वरूप हैं, वे साधु हैं और सत्य पराक्रमी हैं।

०२

चार धामों में से एक रामेश्‍वरम धाम में श्रद्धालुओं की यात्रा तभी संपन्‍न होती है जब वे इसके निकट स्थित अन्‍य तीर्थस्‍थलों के दर्शन करते हैं। रामेश्‍वरम् के पास हनुमान कुंड, अमृत वाटिका और बराम तीर्थ जैसे दार्शनिक और धार्मिक स्‍थल भी हैं। रामेश्‍वरम के प्रमुख आकर्षणों में एक रामसेतु भी है, यह तमिलनाडु के रामानाथुन जिले में स्थित है। हालांकि यहां तक पर्यटकों के जाने पर स्थानीय प्रशासन की तरफ से रोक है लेकिन धनुषकोडि पहुंचकर आप रामायण की कहानी का साक्षात प्रमाण देख सकते हैं।

०३

विष्णुधर्मोत्तर पुराण कहता है कि अनिष्ट नाश के लिए गौ माता का पूजन करें। जो व्यक्ति प्रतिदिन गौ सेवा या रोटी-चारा दान करता है, उसकी परेशानियाँ अपने आप दूर हो जाती हैं। भोजन से पहले गाय को अर्पित करने वाला श्री, विजय और ऐश्वर्य पाता है। शनिवार को सरसों का तेल लगाकर तिल के दाने वाली रोटी चितकबरी या काली गाय को खिलाने से दरिद्रता मिटती है।

०४

सतयुग में सभी पर्वतों के पंख हुआ करते थे, एक बार इन्द्रदेव के यज्ञ में विघ्न पड़ने के कारण इन्द्रदेव ने सभी पर्वतों के पंखों को काट दिया था। श्री हनुमान जी के पिता वायुदेव ने पर्वतों के राजा मैनाक की रक्षा की थी, यही मैनाक पर्वत आखिरी पंखधारी पर्वत हैं। समुन्द्र लांघ कर जब हनुमान जी लंका जा रहे थे, तब इन्हीं मैनाक पर्वत ने हनुमान जी से विश्राम करने की विनती की थी।

०५

श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त और महान संत वल्लभाचार्य जी जब बनारस के हनुमान घाट पर दोपहर में स्नान करने गए, तो वहाँ मौजूद लोगों ने एक अद्भुत दृश्य देखा। गंगा जी की मध्यधारा में संत वल्लभाचार्य जी का शरीर दिव्य अग्नि की लपट में बदलने लगा, जो धीरे-धीरे आकाश की ओर उठती चली गई। उनका लौकिक शरीर उस अलौकिक अग्निशिखा में परिवर्तित हो गया, और इसी अग्निस्वरूप में रहकर वे अपने आराध्य श्रीकृष्ण के धाम में विलीन हो गए।

०६

ब्रह्माण्ड पुराण एवं वायु पुराण के अनुसार अणिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व और वशित्व अष्ट सिद्धियां दुनिया में सबसे बड़ी ताक़त मानी जाती है, यह सभी सिद्धियाँ केवल हनुमान जी के पास ही हैं और इन्हें संभालने की शक्ति भी केवल महाबली हनुमान में ही है। श्रीराम भक्त हनुमान को इन आठ सिद्धियों और नौ निधियों का वरदान मां जानकी ने दिया है।

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पृष्ठ अंतिम बार अपडेट: ६ जून २०२६, २२:०० · अगला अद्यतन: ६ जून २०२६, २३:००