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वक्रतुण्ड महाकाय, गणेश अथर्वशीर्ष — हिन्दी अनुवाद और जप-गणना के साथ।
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केरल के शरण गुरुवयूर नें भगवान श्री कृष्ण की 60 फीट ऊँची और 34 फीट चौड़ी यह चित्रकला 100 दिनों में बनायी है। शरण गुरुवयूर अभी भी इस चित्रकला को स्थापित कराने के लिये संघर्ष कर रहें हैं, इन्होनें भगवान श्री विष्णु के महाअवतारों की कई अन्य चित्रकलाएं भी बनाई हैं जो बहुत लोकप्रिय हैं।
श्री रामकृष्ण परमहंस जी कोलकाता के दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पुरोहित थे, माँ काली के अनन्य भक्त रामकृष्ण परमहंस जी नें वैवाहिक जीवन से सन्यास ले लिया था। वे अपनी पूजा में पूरी तरह मग्न रहते और माँ काली से बात करते थे। इन्हें हर स्त्री में माँ काली ही दिखाई देती थीं, इसी कारण यह अपनी पत्नी शारदामणि जी को भी माँ कह कर पुकारने लगे थे। इनकी पत्नी इनके धर्म-मार्ग में बाधा नहीं बनना चाहती थी, इसी कारण इन्होनें अपने पति से वर्ष में एक बार दर्शन पाने की विनती की।
श्रावण मास में शिव की भक्ति के साथ-साथ श्रीकृष्ण की आराधना का भी विशेष महत्त्व बताया गया है। मान्यता है कि श्रावण कृष्ण पक्ष की अष्टमी से लेकर भादो कृष्ण पक्ष की अष्टमी (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी) तक जो भक्त निरंतर कृष्ण का स्मरण या पूजा करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा जाता है कि इस महीने में श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न रहते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।
हिंदू धर्म में सूर्यदेव, गणेशजी, माँ दुर्गा, शिव-शंकर और विष्णुजी को पंचदेव कहा गया है। किसी भी पूजा या धार्मिक अनुष्ठान में इन पंचदेवों का स्मरण अत्यंत आवश्यक है। प्रतिदिन इनका ध्यान करने से समस्त कार्य मंगलमय तरीके से पूरे होते हैं।
चरक संहिता के आधार पर बीएन माथुर ने लिखा है कि भारत में हीट एसिड कागुलेटेड मिल्क के बारे में ईसा से 300 वर्ष पूर्व का प्रमाण मिलता है। कुषाण और सतवाहन काल में इसका उल्लेख मिलता रहा है। इसे ही आज पनीर के रूप में जानते हैं। ऋग्वेद के इस श्लोक दृते॑रिव तेऽवृ॒कम॑स्तु स॒ख्यम् । अच्छि॑द्रस्य दध॒न्वत॒: सुपू॑र्णस्य दध॒न्वत॑: में भी दूध से निर्मित होने वाली पनीर जैसी चीज़ का वर्णन मिलता है, भारत में दही से मक्खन अलग करने की प्रक्रिया काफ़ी पुरानी रही है। पुराणों में वर्णित है कि भगवान श्रीकृष्ण बचपन में मक्खन चुरा कर खाया करते थे, गौ दुग्ध से निर्मित कई खाद्य पदार्थों का सेवन भारत में प्राचीन काल से ही होता आया है।
ऋग्वेद में गौ को ‘अदिति’ कहा गया है—‘दिति’ का अर्थ है ‘नाश’ और ‘अदिति’ का मतलब ‘अविनाशी अमृतत्व’। इस तरह वेद ने गाय को अमृतत्व का प्रतीक माना है। श्रीमद्भागवत में श्रीशुकदेव जी वर्णन करते हैं कि भगवान गोविंद (श्रीकृष्ण) जब अपनी समृद्धि, सौंदर्य और ज्ञान-महिमा देखते, तो वे स्वयं भी हैरत में पड़ जाते। कहा जाता है कि उनके पास जो भी ऐश्वर्य, भक्ति, ऋषि-मुनि और देवताओं की कृपा एक साथ मौजूद थी, वह गौ-सेवा का ही फल था। यह प्रसंग गौ माता के प्रति भगवान तक की अगाध श्रद्धा को दर्शाता है।
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