पापमोचिनी एकादशी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। चैत्र का महीना आत्मशुद्धि और नवआरंभ का प्रतीक माना जाता है, जब वसंत ऋतु के साथ मन और वातावरण में भी नई चेतना का संचार होता है। इसी पावन समय में आने वाली यह एकादशी पापों के नाश से जुड़ी मानी गई है, इसलिए इसे पापमोचिनी कहा जाता है। भविष्योत्तर पुराण में इस व्रत का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप की श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। यह एकादशी होलिका दहन और चैत्र नवरात्रि के मध्य आती है, जिससे इसका आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से इस व्रत को रखने और गलत कर्मों से दूर रहने का संकल्प लेने से मनुष्य को तन और मन की शुद्धता प्राप्त होती है। यह व्रत पश्चाताप, संयम और आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।