शारदीय नवरात्रि का समापन विजयादशमी के रूप में होता है, जो असत्य पर सत्य की निर्णायक विजय का प्रतीक है। आश्विन मास की शुक्ल दशमी पर मनाया जाने वाला यह पर्व माता महिषासुरमर्दिनी दुर्गा और भगवान श्री राम की अर्चना से आरंभ होता है। इस दिन शमी‑पूजन, अपराजिता‑पूजा और सीमा‑अवलंघन जैसी परंपराएँ निभाई जाती हैं; साथ‑ही नवग्रह‑शांति हेतु विशेष हवन भी किया जाता है। आश्विन स्वयं शरद ऋतु का अग्रदूत है—नीला आकाश, मंद बयार और खेतों में पकती नई फसल की सुगंध वातावरण को उल्लासपूर्ण बनाती है। विजयादशमी की पूजा‑विधि साधक को शक्ति, साहस और संतुलन का संदेश देती है, याद दिलाती है कि धर्मोन्मुख आचरण से अंततः सत्य ही प्रतिष्ठित होता है।