माघ मास की कड़कती ठंड में जब खेतों पर ओस चमकती है, तब आने वाली कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु का उपवास-पूजन करने से धन-ऐश्वर्य और सद्बुद्धि के द्वार खुलते हैं। ‘तिल’ को महालक्ष्मी का प्रतीक माना गया है, इसलिए स्नान से लेकर भोग तक—हर विधि में तिल का प्रयोग अनिवार्य है। पद्म-पुराण में वर्णन है कि इसी तिथि पर तिल से स्नान, उबटन, आहुति, तर्पण, दान और सेवन—ये छह क्रियाएँ पापों का क्षय करती हैं; यही कारण है कि इसे ‘षटतिला’ कहा जाता है। भक्तजन भगवान कृष्ण को फल-फूल, गुड़ तथा तिल के लड्डू अर्पित करते हुए “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करते हैं और मानते हैं कि तिलपूर्ण दान से घर में स्थायी समृद्धि व शांति आती है।