फाल्गुन हिन्दू पंचांग का अंतिम महीना है। सर्दियों की विदाई और वसंत के आगमन के बीच आने वाला यह समय भक्ति के साथ उमंग और मेल-मिलाप का संदेश देता है। उत्तर भारत में विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र की होली और राधा-कृष्ण से जुड़े उत्सव इसी महीने से आरंभ हो जाते हैं।
फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनाई जाती है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और रात्रि जागरण में भगवान शिव का ध्यान करते हैं। शुक्ल पक्ष में फुलेरा दूज से ब्रज की होली का रंग और गहरा होने लगता है। इसके बाद आमलकी एकादशी आती है, जिसमें भगवान विष्णु के साथ आँवले के वृक्ष की पूजा की जाती है।
फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या पर होलिका दहन होता है और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। होलिका दहन को बुराई और अहंकार पर भक्ति की जीत का प्रतीक माना जाता है, जबकि होली आपसी मनमुटाव भुलाकर साथ आने का अवसर देती है। अलग-अलग क्षेत्रों में लट्ठमार होली, फूलों की होली, धुलेंडी और डोल उत्सव जैसी परंपराएँ इस पर्व को अपना स्थानीय रंग देती हैं।