भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को कहा जाता है। फाल्गुन का महीना वसंत ऋतु का प्रतीक है, जब प्रकृति में उल्लास, नवीनता और सौम्यता का संचार होता है। इसी पवित्र और शांत वातावरण में भगवान गणेश के भालचंद्र स्वरूप की उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है। संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और घर में सुख-शांति का वास बना रहता है। हिंदू पंचांग के अनुसार पूरे वर्ष में तेरह संकष्टी चतुर्थी व्रत होते हैं और प्रत्येक का अपना अलग महत्व और कथा होती है। भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को लड्डू, शकरकंद और फलों का भोग अर्पित किया जाता है। भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं और संध्या समय चंद्रदर्शन के बाद पूजा संपन्न करते हैं। श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया यह व्रत विशेष रूप से विघ्नों को दूर करने वाला और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है।