होलिका दहन फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि की संध्या में किया जाने वाला एक प्रमुख हिंदू पर्व है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व होली उत्सव का आरंभिक चरण है, जिसे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, होलिका दहन की कथा भक्त प्रह्लाद और उसकी बुआ होलिका से जुड़ी है। दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति से रोकने के लिए अनेक प्रयास किए, लेकिन जब वह असफल रहा, तो उसने अपनी बहन होलिका की सहायता ली। होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, परंतु जब वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठी, तो स्वयं जल गई और भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, होलिका दहन पूर्णिमा तिथि में प्रदोष काल के दौरान करना शुभ माना जाता है। इस समय लोग होलिका की अग्नि में अन्न और अन्य सामग्री जैसे गेहूं, चना, नारियल आदि अर्पित करते हैं। इसके साथ ही होलिका की परिक्रमा कर सुख-समृद्धि और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की कामना की जाती है।