शरदकालीन आश्विन माह की सौम्य रोशनी में आने वाला गुरु प्रदोष व्रत भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ साधन है। प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी पर रखा जाने वाला यह उपवास संध्या के प्रदोष काल, सूर्यास्त से ठीक पहले और बाद, में शिव‑आराधना से पूर्ण होता है। पंचामृत से अभिषेक, फिर शुद्ध जल, रोली‑मौली, अक्षत, धूप‑दीप के साथ पूजन करने से साधक के दोष क्षीण होते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि इसी व्रत की महिमा से देवराज इन्द्र ने वृत्तासुर पर विजय पाई; इसलिए शत्रु‑जय हेतु इसे परम प्रभावी माना गया है। आज भी शिवालयों में सफेद चावल की खीर अर्पित कर भक्त अचल ऐश्वर्य व संरक्षण की कामना करते हैं। आश्विन माह की हल्की ठंडक और पकती फसलों की सुवास इस साधना को और भी दिव्य बना देती है।