नवरात्रि व दशहरा के बाद आने वाली आश्विन शुक्ल द्वादशी ‘पद्मनाभ द्वादशी’ कहलाती है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ‑स्वरूप की आराधना साधक को सुख‑समृद्धि, ऐश्वर्य और स्थिर वैभव प्रदान करती है। उदयकाल से आरम्भ होने वाला यह व्रत शुभारम्भ का प्रतीक माना गया है; मान्यता है कि इस तिथि पर शुरू किया गया कोई भी कार्य मंगलफल देता है। पूजा‑विधि में भगवान को गुड़, ताज़ा कमल और तुलसी‑दल अर्पित किए जाते हैं, साथ ही केले के वृक्ष की धूप‑दीप से आरती कर विष्णु‑कृपा मांगी जाती है। आश्विन मास स्वयं शरद ऋतु की सौम्य ठंडक, सुनहरे खेत और स्वच्छ नभ का संकेतक है, जो भक्त के मन में नई स्फूर्ति और आध्यात्मिक उमंग जगाता है।