आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाने वाला शारदीय नवरात्रि देवी‑उपासना का परम अवसर है। प्रतिपदा को शुद्ध मिट्टी से भरे कलश में जौ या गेहूँ बोकर घटस्थापना होती है, कलश पर नारियल रखा जाता है और अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है, जो पूरे अनुष्ठान के दौरान सतत् जलती रहती है। इसके बाद नौ (यदि चतुर्थी क्षय हो तो आठ) दिनों तक शक्ति के क्रमिक रूप—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री—की पूजा साधक को आत्मबल, निर्भयता और समृद्धि प्रदान करती है। उपवास, दुर्गासप्तशती पाठ, पुष्प‑अर्पण और आरती के माध्यम से साधक शक्ति‑तत्त्व से जुड़ता है; विश्वास है कि भक्तिभाव से संपन्न यह साधना जीवन से विघ्न हटाकर आरोग्य, सौभाग्य और मनोवांछित सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।