आश्विन अमावस्या के बाद जब आकाश में प्रथम बार चन्द्रमा की क्षीण रेखा झलकती है, उसी क्षण को आश्विन चन्द्र‑दर्शन कहते हैं। वेद‑पुराण चन्द्रदेव को सोम, सुधाकर और सुधांशु नामों से पुकारते हैं तथा उन्हें ज्ञान, मन और रस का अधिपति मानते हैं। परम्परा है कि इस नव‑चन्द्र के दर्शन पर अर्घ्य अर्पित कर खीर का नैवेद्य समर्पित किया जाए और मंत्र जप किया जाए—“ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि, तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्।” माना जाता है कि ऐसा करने से चन्द्रमा की शीतल ऊर्जा साधक की बुद्धि, भावनाओं और सौभाग्य को प्रबल करती है। करवा‑चौथ अथवा त्रयोदशी जैसे व्रतों में चन्द्रोदय की प्रतीक्षा का कारण भी यही मान्यता है: नवोदित चन्द्रदेव की एक झलक मन को संतुलित करती है, पवित्र अभिलाषाएँ पुष्पित करती है और परिवार में शान्ति‑समृद्धि का संचार करती है।