आश्विन मास में आने वाला शुक्र प्रदोष भगवान शिव‑पार्वती की कृपा पाने का सुवर्ण अवसर माना जाता है। त्रयोदशी की प्रदोष वेला में निर्जल उपवास रखकर घृत‑दीप, बिल्व‑पत्र, काले तिल और गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है; तत्पश्चात् माँ पार्वती के साथ युगल ध्यान करने से दरिद्रता, ऋण‑भार और रोग‑शोक शीघ्र विदा होते हैं। प्रदोष व्रत पक्षानुसार द्वि‑मासिक है, परन्तु शुक्रवार को पड़ने वाला प्रदोष विशेष फलदायी माना जाता है, क्योंकि शुक्र ग्रह सौंदर्य, ऐश्वर्य व सौभाग्य का प्रतीक है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन मानसिक पूजा भी उतनी ही प्रभावी होती है; साधक की निष्ठा से प्रसन्न होकर महादेव उसे आयु, आरोग्य और संपन्नता का अनवरत आशीर्वाद प्रदान करते हैं।