आश्विन कृष्ण अमावस्या को मनाई जाने वाली सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष का शिखर बिंदु है। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि पूर्वजों की पुण्य‑तिथि स्मरण न हो, तो इसी दिन एकसाथ सबका श्राद्ध‑तर्पण कर देना चाहिए; इससे सभी पितर संतुष्ट होते हैं और कुल पर उनका आशीष बरसता है। प्रातः स्नान के बाद कुश‑अंगूठी धारण कर तिल‑जल से आह्वान, फिर तिल, अक्षत, पके चावल और घृत से पिण्ड अर्पित किए जाते हैं। दक्षिणाभिमुख बैठकर धूप‑दीप व मंत्र‑तर्पण करने से साधक के मन में अदृश्य शांति प्रवाहित होती है, साथ ही घर‑परिवार में आरोग्य और समृद्धि का स्थायी वास माना जाता है। सर्वपितृ अमावस्या इस विश्वास को पुष्ट करती है कि पूर्वजों के ऋण से मुक्त हुए बिना जीवन का संतुलन पूर्ण नहीं होता।