मार्गशीर्ष के सुहावने सोमवार को पड़ने वाली त्रयोदशी ‘सोम प्रदोष व्रत’ कहलाती है। अगहन मास की ठंडी, सुवासित हवा और आध्यात्मिक उमंग इस उपवास की महत्ता कई गुणा बढ़ा देती है। शास्त्रों में इसका पुण्य दो गौ-दान के बराबर बताया गया है; साथ-ही कुंडली के चंद्र को भी बल मिलता है। प्रदोष-काल में शुद्ध जल, चंदन, बिल्वपत्र, धूप-दीप और प्रसाद चढ़ाते हुए ‘ॐ नमः शिवाय’ का सघन जप करें, फिर पार्वती, गणेश और कार्तिकेय सहित शिव-परिवार का आवाहन करें। श्रद्धा-पूर्वक रखा गया यह व्रत विघ्न-बाधाएँ शांत करता है, भाग्य को जाग्रत करता है और घर-परिवार में स्थायी शांति-समृद्धि का आशीर्वाद देता है।