आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को ‘शरद’ या ‘कोजागर’ पूर्णिमा कहते हैं। शास्त्रों में मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी आकाश‑विचरण करते हुए पुकारती हैं—“को जागर्ति?” अर्थात कौन जाग रहा है? जो साधक जगकर लक्ष्मी‑पूजन करता है, उस पर समृद्धि की वर्षा होती है और दरिद्रता मिटती है। परम्परा के अनुसार, इस चाँदनी रात में घर‑आँगन के कोने‑कोने में घी के ग्यारह दीप जलाए जाते हैं; दूध‑चावल की खीर खुले आकाश तले रख कर ‘अमृत‑किरणों’ का स्पर्श दिया जाता है। विश्वास है कि चन्द्र‑तत्व से पूरित यह प्रसाद आरोग्य और सौभाग्य बढ़ाता है। आश्विन मास अपने साथ शरद ऋतु की शीतल बयार, स्वच्छ गगन और पके धान की सुवास लाता है; इसी सौम्य वातावरण में कोजागरी व्रत साधक को मन, वचन और कर्म से जागरूक रहने की प्रेरणा देता है।