माघ मास की शीतल संध्या में आने वाला प्रदोष यदि रविवार को पड़े, तो उसे रवि प्रदोष कहा जाता है। इस व्रत में शिव-पार्वती के साथ सूर्यदेव की भी आराधना की जाती है, क्योंकि सूर्य-तत्त्व से जीवन में तेज, यश और दीर्घायु का वरदान मिलता है। वर्ष भर कुल चौबीस प्रदोष तिथियाँ होती हैं; किन्तु जो उपासक रवि प्रदोष का नियमपूर्वक अनुष्ठान करते हैं, उन्हें सूर्य और चंद्र दोनों ग्रहों का सहकार प्राप्त होता है। परम्परा कहती है कि लगातार ग्यारह प्रदोष या सम्पूर्ण वर्ष की त्रयोदशी उपवास करने से सर्वकार्य सिद्धि सहज बन जाती है। इस दिन संध्या बेला में दीप जलाकर, बेलपत्र, काले तिल तथा गन्ने का रस अर्पित किया जाता है। आशय यही कि माघ का रवि प्रदोष साधक को बाहरी सफलता और भीतरी संतुलन दोनों प्रदान करता है।