पौष मास की कड़ाके की सर्दी में आने वाला भौम प्रदोष व्रत—मंगलवार को पड़ने वाली त्रयोदशी—भगवान शिव की विशेष अनुकम्पा दिलाने वाला माना जाता है। उत्तर भारत में इसे प्रदोष व्रत तथा दक्षिण में प्रदोषम् कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र बताता है कि प्रत्येक वार के प्रदोष की अलग‑अलग सिद्धि होती है; पर मंगलवार के प्रदोष से ऋण‑मुक्ति और पारिवारिक सुख का मार्ग खुलता है। अभिषेक में गंगाजल, गाय का ताजा दूध, शुद्ध घी और बेलपत्र अर्पित करते हुए रुद्राष्टक या महामृत्युंजय जप सर्वोत्तम फल देता है। संध्या समय हनुमान चालीसा की सात आवृत्तियाँ कष्टों का नाश करती हैं। प्रदोष‑काल सूर्यास्त से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व शुरू होकर डेढ़ घंटा बाद तक रहता है; इसी अवधि में उपवास‑पूजन और दीपदान करने से व्रत पूर्ण फल देता है।