भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से आरम्भ होने वाला महालक्ष्मी व्रत सोलह दिनों तक चलता है और समूचे घर में समृद्धि की कामना जगाता है। स्नान‑संध्या पर कलश स्थापित कर गेहूँ के जवारे बोए जाते हैं; अगले पन्द्रह दिनों तक इन्हें रोज़ जल देकर देवी‑कृपा का अंकुरण माना जाता है। समापन आश्विन कृष्ण अष्टमी को होता है, जब महालक्ष्मी के साथ उनके गज‑लक्ष्मी स्वरूप और प्रतीकात्मक हाथी की पूजा की जाती है। देवी के आठ स्वरूप, आदि, धन, गज, धान्य, वीर, विजय, सन्तान और विद्या लक्ष्मी, प्रतिदिन क्रमशः विशेष आराधना पाते हैं। श्रद्धापूर्वक निभाया गया यह अनुष्ठान ऋण‑मुक्ति, धन‑वृद्धि, सन्तान‑कल्याण और पारिवारिक सौहार्द का सुनिश्चित आशीष माना जाता है।