भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को मनाया जाने वाला वामन प्राकट्योत्सव विष्णु के पाँचवें अवतार की उज्ज्वल स्मृति है। परंपरा कहती है कि श्रवण नक्षत्र के अभिजित मुहूर्त में माता अदिति ने एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया, जिसने आगे चलकर राजा बलि के यज्ञ‑मण्डप में तीन पगों में त्रिलोक को नाप कर धर्म‑मर्यादा स्थापित की। उपनयन‑संस्कार के समय ऋषि अंगिरस ने वस्त्र, अगस्त्य ने मृगचर्म, सूर्य ने छत्र, बृहस्पति ने जनेऊ‑कमण्डल, मरीचि ने पलाश‑दण्ड, भृगु ने खड़ाऊँ, अदिति ने कौपीन, कुबेर ने भिक्षापात्र और सरस्वती ने रुद्राक्ष‑माला प्रदान की, मानो समूचा ऋषि‑मण्डल नवयत संन्यासी को आशीर्वाद दे रहा हो। वामन‑पूजन में आज भी पीत वस्त्र, तुलसी‑दल और गुड़‑चावल अर्पित कर “ॐ वामनाय नमः” का जप किया जाता है; विश्वास है कि इससे अहंकार शान्त होता है और जीवन में धर्म, समृद्धि व विनय का मार्ग प्रशस्त होता है।