भाद्रपद के कृष्ण त्रयोदशी पर जब दिन गुरुवार पड़ता है, तो उसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है। वर्षा थम चुकी होती है, आकाश में शरद की उजली धूप झलकने लगती है, ऐसे शांत संधिकाल में शिव‑पर्वती की आराधना विशेष फलदायी मानी जाती है। साधक सूर्यास्त से ठीक पहले स्नान कर “ॐ नमः शिवाय” तथा “ॐ उमा शिवाय नमः” का जप करते हुए प्रदोष‑काल में घृत‑दीप, बिल्व‑पत्र, आक‑पुष्प और अक्षत अर्पित करता है, फिर साबुत चावल की खीर नैवेद्य रूप में समर्पित की जाती है। पुराण मानते हैं कि यह गुरुवारी प्रदोष दोष‑निवारक, शत्रु‑संहारक और इच्छापूर्ण करने वाला है; श्रद्धापूर्वक रखा गया यह व्रत साधक के जीवन में शांति, साहस और समृद्धि का स्थायी प्रतिष्ठान करता है।