भाद्रपद शुक्ल अष्टमी ब्रज‑भूमि में राधा अष्टमी के रूप में मनाई जाती है। बरसाने के राजा वृषभानु की सुपुत्री राधा का जन्म सावन की हरियाली थमने और शरद के उजास की आहट के बीच हुआ माना जाता है; इसलिए यह पर्व प्रेम‑रस और ऋतु‑सौंदर्य दोनों का संगम है। शास्त्रों में राधा को “कृष्ण‑वल्लभा” तथा प्रभु के प्राणों की अधिष्ठात्री कहा गया है। भक्त शुद्ध‑मन से निर्जल उपवास रखते, कमल‑दल, केसर‑चंदन और दही‑माखन अर्पित कर “राधे‑कृष्ण” का जप करते हैं। जन‑विश्वास है कि इस व्रत से आर्थिक कष्ट मिटते हैं और गृह‑लक्ष्मी सदैव विराजती है; वस्तुतः जन्माष्टमी की पूर्णता राधा अष्टमी के माधुर्य के बिना सम्भव ही नहीं मानी जाती।