मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला त्रिपुर भैरवी प्राकट्य उत्सव भगवान शिव के त्रिपुरारी रूप की विध्वंसकारी शक्ति का स्मरण कराता है। दस महाविद्याओं में छठी मानी जाने वाली यह देवी श्यामवर्ण, दिगंबर तथा त्रिनेत्रधारी हैं; उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है, गले में नरमुंडों की माला है, और शरीर रुद्राक्ष-सर्पों से भूषित रहता है। उनकी तेजस्वी आभा सहस्र उदित सूर्यों जैसी वर्णित की गई है, जो सृष्टि के विनाश एवं पुनरुत्पत्ति की निरंतरता का बोध कराती है। इस दिन भक्त प्रातः स्नान कर यथाविधि कलश-स्थापन, दीपाराधना, हवन और “ॐ त्रिपुरभैरव्यै नमः” मंत्र-जप करते हैं। मान्यता है कि देवी के प्रसन्न होने पर साधक के सभी कष्ट विलीन हो जाते हैं तथा इच्छित सिद्धियाँ सहज उपलब्ध हो जाती हैं।