मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पूर्णिमा को माँ पार्वती ने अन्नपूर्णा के दिव्य स्वरूप में अवतार लिया था। इस शुभ दिन को अन्नपूर्णा प्राकट्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन माँ पार्वती ने काशी में मानवता के कल्याण हेतु भोजन और अन्न की व्यवस्था संभाली थी, जबकि भगवान शिव मोक्ष प्रदान कर रहे थे। इस पावन अवसर पर माँ अन्नपूर्णा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु व्रत रखकर माँ को भोग लगाते हैं और घर के चूल्हे की विशेष पूजा करते हैं। इस दिन अन्नदान करने से माँ की कृपा सदैव बनी रहती है, जिससे घर-परिवार अन्न, धन और सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण रहता है। भक्तों के जीवन से दरिद्रता का नाश होता है और उनकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।