हर माह की त्रयोदशी तिथि शिव-भक्तों के लिए विशेष मानी गई है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष—दोनों ही पन्द्रह दिवसीय पक्षों में आने वाली इस संध्या को प्रदोष व्रत कहा जाता है। मान्यता है कि प्रदोष-काल (सूर्यास्त के बाद का पहला प्रहर) में श्रद्धा-पूर्वक भगवान शंकर की आराधना करने से रोग-शोक मिटते हैं और काया निरोगी बनी रहती है। व्रतधारी दिन भर सहज उपवास रखें, प्रदोष-काल में शिवलिंग का दुग्धाभिषेक करें और “ॐ सर्वसिद्धि प्रदाये नमः” मंत्र का 108 बार जप अवश्य करें—इसे उत्तम फलदायी कहा गया है। जिन लोगों को शुक्र-दोष से जुड़ी परेशानियाँ हैं, जैसे नेत्र या चेहरे के रोग, वे सफेद चंदन में गंगाजल मिलाकर लेप तैयार करें और प्रदोष की संध्या-वेला में शिवलिंग पर अर्पित करें। श्रद्धा, संयम और सही विधि—इन तीनों से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।