ज्येष्ठ पूर्णिमा का व्रत मुख्यतः विवाहित महिलाएँ रखती हैं। महाराष्ट्र, गुजरात तथा दक्षिण भारत के अनेक प्रदेशों में यह उपवास विशेष महत्त्व रखता है, जबकि उत्तर भारत में यह ही व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को “वट सावित्री” रूप में मनाया जाता है। पूर्णिमा के दिन प्रातः स्नान कर दान-पुण्य करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। दिन भर निर्जल या फलाहार उपवास रखते हुए स्त्रियाँ वट-वृक्ष के नीचे बैठकर विधिवत् पूजा-अर्चना करती हैं। परंपरा है कि सावित्री की भाँति वे त्रिदेव से अपने पति के दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्ध जीवन की प्रार्थना करती हैं। इस प्रकार वट पूर्णिमा नारी शक्ति के अखण्ड स्नेह, तप और मंगल-कामना का दिव्य प्रतीक बन जाता है।