वट पूर्णिमा व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाएगा। इस दिन सुहागिनें लाल वस्त्र पहनकर और सोलह-श्रृंगार करके बरगद की जड़ में जल, रोली-चावल व फल चढ़ाती हैं, सात या ग्यारह परिक्रमाएँ करते हुए मौली लपेटती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती-सुनाती हैं। इसका मूल उद्देश्य है पति की लंबी आयु, दांपत्य-सुख और संतान-कल्याण की प्रार्थना। अधिकांश महिलाएँ दिन-भर निर्जल या फलाहार उपवास रखती हैं और संध्या में ब्राह्मण तथा वृद्ध सुहागिनों को वस्त्र-दक्षिणा देकर व्रत खोलती हैं। बरगद को त्रिदेवों का प्रतीक और प्रचुर ऑक्सीजन देने वाला पर्यावरण-रक्षक माना जाता है, इसलिए इस दिन उसका पौधा लगाना भी शुभ समझा जाता है।