आश्विन शुक्ल चतुर्थी पर रखा जाने वाला विनायक चतुर्थी व्रत मासिक गणेश‑आराधना का श्रेष्ठ अवसर है। गणेशजी के “विनायक” नाम से अभिहित यह व्रत दो चरणों में सम्पन्न होता है—प्रथम पूजन मध्य‑पूर्वाह्न में, द्वितीय मध्याह्न काल में। साधक शुद्ध जल से स्नान कर स्वच्छ आसन ग्रहण करता है, फिर श्रीगणेश को फल, पुष्प, धूप‑दीप, कपूर, अक्षत और दूर्वा समर्पित कर “विघ्नराजं भजे” का संकीर्तन करता है। गणपति स्तोत्र अथवा गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ साधक के अंतर्मन को स्थिरता देता है और नूतन साहस जगाता है। विश्वास है कि इस पूजन से आरम्भ किया गया कार्य अवरोध‑रहित पूर्ण होता है; अतः विघ्नविनाशक श्रीगणेश की कृपा से संकट दूर होते हैं, मनोरथ सिद्ध होते हैं और परिवार में मंगलमय वातावरण बना रहता है।