हिन्दू पंचांग का ग्यारहवाँ महीना — माघ — शीत ऋतु के अंतिम चरण में आता है और पूरे महीने प्रयागराज के संगम पर कल्पवास, गंगा-स्नान व दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है। इसी माह के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि, जब आकाश में चन्द्रमा पूरी तरह ओझल हो जाता है, ‘दर्श अमावस्या’ कहलाती है। सूर्यास्त के बाद चंद्रदेव का दशोपचार पूजन कर घी का दीप, कर्पूर की धूप, सफेद पुष्प, चंदन, अक्षत और इत्र अर्पित किए जाते हैं। श्वेत चंदन की माला से 108 बार “ॐ ऐं क्लीं सोमाय नमः” जपें और साथ-साथ भगवान शिव का अभिषेक भी करें। विश्वास है कि इस व्रत से सौभाग्य व समृद्धि मिलती है। पितरों की शान्ति हेतु तर्पण, स्नान-दान और ब्राह्मण भोजन कराने से पितृदोष का निवारण होता है।