बजरंगबली का जन्मोत्सव वर्ष में दो बार मनाया जाता है, पहला चैत्र पूर्णिमा पर, दूसरा दीपोत्सव-पर्व की कृष्ण चतुर्दशी, जिसे नरक चतुर्दशी भी कहते हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमान-जी का अवतरण कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की अर्द्ध-रात्रि में हुआ, इसलिए इस तिथि पर उनका पूजन परम फलदायी माना गया है। विश्वास है कि इससे मनोकामनाएँ पूरी होती हैं तथा मंगल, शनि, राहु-केतु और सूर्य-दोष शांत होते हैं। साधक पहले शुद्ध स्नान कर लाल या केसरिया वस्त्र धारण करें, फिर पीपल के ग्यारह पत्तों पर ‘श्रीराम’ लिखकर माला गूँथें और बजरंगबली को अर्पित करें। गुड़-चने का नैवेद्य लगाएँ, तिल या घी का दीप जलाकर हनुमान चालीसा अथवा सुंदरकाण्ड का पाठ करें। कहा जाता है कि इस सरल-सी आराधना से साहस, आरोग्य और दैवी संरक्षण का अमोघ आशीष प्राप्त होता है।