कार्तिक‑मास की कृष्ण अष्टमी पर मनाई जाने वाली कालभैरव कालाष्टमी भय‑नाश और साहस‑वृद्धि का पर्व है। इस दिन साधक श्री कालभैरव—शिव के उग्र, रक्षक रूप—की उपासना कर रोग, शत्रु और अकाल‑मृत्यु से सुरक्षा की कामना करते हैं। पूजन‑विधि में ‘ॐ भैरवाय नमः’ जपते हुए चंदन, अक्षत, रक्त‑पुष्प, सुपारी, नैवेद्य तथा दीप‑धूप अर्पित किए जाते हैं; तिल का दीप भैरव को विशेष प्रिय माना गया है। नारद पुराण निर्देश देता है कि कालाष्टमी पर भैरव‑सहित माता दुर्गा का भी स्तवन किया जाए, जिससे जीवन में संयम, न्याय‑बुद्धि और निर्भयता बनी रहे। कार्तिक स्वयं तप‑दान और दीप‑अनुष्ठानों का महीना है—हल्की ठंडक और दीप‑पंक्तियों के बीच की गई भैरव‑आराधना साधक को आत्म‑अनुशासन, तेजस्विता और आध्यात्मिक बल का अनूठा संगम प्रदान करती है।