ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी को मनाया जाने वाला धूमावती प्राकट्योत्सव देवी की दुर्लभ व तेजस्वी छवि का उत्सव है। दश महाविद्याओं में सातवीं—दारुण विद्या—यानी धूमावती को संहार व शाप-शक्ति की अधिष्ठात्री माना गया है। अंगीरा, दुर्वासा, परशुराम और भृगु जैसे तेज-क्रोधी ऋषियों की मूल शक्ति भी यही मातृशक्ति हैं। इस दिन महाविद्याओं की सामूहिक पूजा की परम्परा है, पर सुहागिन स्त्रियाँ धूमावती की आराधना से विरत रहती हैं; उनका पूजन मुख्यतः वे लोग करते हैं जो तंत्र-साधना, विपरीत परिस्थितियों से रक्षा या शत्रु बाधा निवारण का संकल्प रखते हैं। विधि सरल है—सघन धूप, काले तिल, नीले पुष्प और धृत दीपक से देवी का आवाहन करें, फिर शांत मन से अपना संकल्प व्यक्त करें। मान्यता है कि सच्ची आस्था के साथ किया गया यह उपासना-अनुष्ठान छुपे भय, रोग, और विरोधी शक्तियों को धूम-रूप में भस्म कर देता है।