विकट संकष्टी चतुर्थी पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान गणेश के विकट स्वरूप की पूजा का विशेष विधान है। चैत्र–वैसाख जैसे ऋतु परिवर्तन के काल में आने वाला यह व्रत जीवन की बाधाओं से मुक्ति और मानसिक स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से कष्ट, विघ्न और असफलताएँ दूर होती हैं तथा कार्य बिना रुकावट पूर्ण होते हैं। इस दिन लाल वस्त्र धारण कर भगवान गणेश को तिल, गुड़, लड्डू, पुष्प, धूप, चंदन, केला या नारियल अर्पित किए जाते हैं। गणपति अथर्वशीर्ष और गणेश चालीसा का पाठ विशेष फलदायी माना गया है। संध्या समय चंद्रदर्शन का भी महत्व है। चंद्रमा को शहद, चंदन और रोली मिश्रित दूध से अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण किया जाता है। यह व्रत श्रद्धा, संयम और संकटों से उबरने की आस्था से जुड़ा है।