माघ मास में जाड़े की धार धीमी पड़ने लगती है और खेतों में सरसों के पीले फूल बसंत की आहट सुना देते हैं। ऐसी ही हवाओं में मनाई जाने वाली लम्बोदर संकष्टी चतुर्थी, जिसे सकट चौथ भी कहते हैं, संतान-सुख और पारिवारिक कल्याण हेतु प्रतिष्ठित व्रत है। पद्म-पुराण बताता है कि स्वयं संकट-मोचन गणपति ने इसका विधान माता पार्वती को बताया; तभी से माताएँ निःजल रहकर गणेश तथा चंद्रदेव की आराधना करती हैं। पूजा-स्थल पर पीले पुष्प, तिल-गुड़, धूप-घी, रोली और कलावा अर्पित कर श्रीगणेश का षोडशोपचार पूजन होता है। रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर परिवार की सुख-समृद्धि तथा संतानों की दीर्घ आयु की कामना की जाती है। अगले प्रातः सकट माता पर चढ़े लड्डू, तिलकुट और अन्य पकवान प्रसाद रूप में बाँटे जाते हैं, जिनसे मान्यता है कि रोग-शोक मिटते हैं और जीवन में आनंद का संचार होता है।