आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाने वाली विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी, श्राद्ध‑काल में आने से और भी प्रभावशाली मानी जाती है। कहते हैं, इस दिन श्रीगणेश की भक्तिपूर्वक आराधना न केवल सारे विघ्न दूर करती है, बल्कि पितरों की प्रसन्नता भी अर्जित कराती है। साधक प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर लाल‑पीले वस्त्र धारण करें, गंध‑अक्षत‑पुष्प चढ़ाएँ और विशेष रूप से इकतीस दूर्वा‑दल अर्पित करें; दिन‑भर व्रत रखकर चंद्र‑दर्शन के बाद नैवेद्य ग्रहण करें। आश्विन शरद ऋतु का आरम्भ है, धान के खेतों में सोना पकने लगता है, हवा सुहानी हो जाती है और नवरात्र की मंगल‑ध्वनि सुनाई देती है। ऐसे पावन माह में की गई गणेश‑आराधना आने वाले पर्वों के लिए श्रद्धा और सौभाग्य का द्वार खोलती है।