भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाने वाली संकष्टी चतुर्थी, हेरम्ब गणपति, पाँच मुख और दस भुजाओं वाले संकटमोचक स्वरूप, की आराधना का विशेष दिन है। भाद्रपद में वर्षा कम होने लगती है, खेतों में धान की बालियाँ लहराती हैं और हवा में शरद की हल्की ठंडक घुल जाती है; ऐसे वातावरण में यह व्रत जीवन को ताज़गी और आश्वस्ति देता है। व्रती प्रातः स्नान कर निराहार रहते हैं, संध्या के चंद्रोदय पर चंद्रमा तथा गणेश दोनों को अर्घ्य चढ़ाते हैं और तिल-गुड़ अथवा मोदक का नैवेद्य अर्पित करते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार, इस उपवास से समस्त विघ्न दूर होते हैं और साधक को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के साथ विद्या, धन व उत्तम स्वास्थ्य का वरदान प्राप्त होता है।