मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को ‘गणाधिप संकष्टी चतुर्थी’ कहा जाता है। इस पावन दिन सूर्योदय से चन्द्रदर्शन तक निराहार व्रत रखकर श्री गणेश की शुद्ध भक्ति-भाव से पूजा की जाती है। पुराणों में वर्णित है कि माता गौरी के प्रिय पुत्र गणेश इस तिथि पर शीघ्र प्रसन्न होकर भक्तों के संकटक्लेश तथा विघ्नों का नाश करते हैं; इसलिए उन्हें ‘विघ्नहर्ता’ कहा जाता है। गन्ध, पुष्प, दूर्वा तथा मोदक समर्पित कर ‘गणाधिपाय नमः’ मंत्र जपने से घर-परिवार से नकारात्मकता दूर होती है और समृद्धि, शांति व बौद्धिक तेज प्राप्त होता है। मार्गशीर्ष की ठंडी, निर्मल हवाओं के संग यह व्रत खेती के नये अंकुरों-सा आशा और शुभता का संचार करता है।