कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि ‘पौष अमावस्या’ को शास्त्रों में महापुण्यदायिनी कहा गया है। ठिठुरती हेमंत ऋतु के बीच इस दिन सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में स्थित होते हैं; इसी योग से जप‑दान का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। पितृ‑तर्पण, श्राद्ध और दीपदान करने से पितरों को शांति मिलती है तथा पितृ‑दोष और कालसर्प‑दोष शांत होते हैं। व्रती प्रातःस्नान के बाद तांबे के लोटे में शुद्ध जल, लाल चंदन, अक्षत और लाल पुष्प डालकर सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करता है। माना जाता है कि यह विधि रोग‑शोक दूर कर घर में सुख‑समृद्धि लाती है। साथ ही उपवास, गौ‑दान और अन्न‑दान जैसे कर्म जीवन को पाप‑मुक्त करके उज्ज्वल मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं।