आश्विन शुक्ल पंचमी, शारदीय नवरात्रि के मध्य दिन, को मनाया जाने वाला उपांग ललिता व्रत देवी त्रिपुरसुन्दरी की आराधना का विशेष पर्व है। कथा कहती है कि सती के आत्मत्याग के पश्चात जब शिव शोक‑विह्वल होकर उनके अंग लिए भ्रमण करने लगे, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से देह विभाजित कर जगत को संकट से उबारा। उसी क्षण शक्ति का तेज ललिता नाम से प्रकट हुआ, जिसने शिव को अपने हृदय में धारण किया। कालिका‑पुराण बताता है कि गौरवर्ण, दो भुजाओं वाली यह देवी रक्तकमल पर आरूढ़ है और चण्डी‑सदृश पूजा स्वीकार करती है। व्रती प्रातः स्नान कर लाल पुष्प, सिंदूर, अक्षत, घृत‑दीप और नैवेद्य अर्पित करते हैं तथा “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ललितायै नमः” मंत्र जपते हैं। श्रद्धापूर्वक किया गया उपांग ललिता व्रत साधक को सौंदर्य, समृद्धि और विजय का आशीष प्रदान करता है।